मेरी दैनन्दिनी 2
२० फ़रवरी २००५ पता नहीं , आत्म्विश्वास नाम की कोई चीज होती भी है या नहीं . या फ़िर वो सिर्फ़ एक ज़िद हुआ करती है जो कभी कभी लोगों को हमारे खुद के सच का आईना दिखला जाती है बस...।कभी कभी सोचने लगता हूँ कि क्या वास्तव में हम सिर्फ़ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं या फ़िर हम सभी लोग एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ आदि युद्ध है, मध्य युद्ध है और अन्त भी सिर्फ़ युद्ध... जहाँ हार जीत के मायने नहीं हैं मायने अगर किसी चीज के हैं तो वो ये कि सभी लड़ रहे हैं. वैसे सच कहूँ तो मैं इस लड़ाई से थक गया हूँ अब. दूसरों के बारे में सोचने का ना तो मेरा मन है ना ही शायद कोई ईच्छा... और फ़िर भी अपने आप को समझाने का मैं कोई प्रयास नहीं कर रहा हूँ. सच एक ही रहेगा और चाहे उसे बदलने के लिये आप अपना इतिहास भी बदल लो वो सच नहीं बदलेगा. आप चाहो ना चाहो उस एक सच के साथ जीने की आदत आप विकसित कर लेते हो पर सवाल ये है कि... आखिर ऐसे कितने सच और.. और ऐसा कितनी बार और... पता नहीं दुनिया में ऐसी कितनी बातें होंगी जिनकी व्याख्या किसी के द्वारा ना की गयी होगी और ना की जा सकेगी । फ़िर भी हर कोई जानता है. लेकिन जाने क्यों सबके जानने के...