Posts

तुम भाग-३

स्वप्न सी अविश्वसनीय सही , पर परिचित एक यथार्थ हो तुम , मेरा स्वयं हो अक्सर , तो कभी सिर्फ मेरा स्वार्थ हो तुम.. कारण नहीं किसी परिवर्तन का , या फिर किसी समर्पण का , पर फिर भी भक्तिभाव हो तुम , जीवन का परमार्थ हो तुम.. खुद से खुद की आस्था , या विश्वास भरा एक भ्रम हो तुम. सुर्ख दहकती ताप सी , या आँसू सी नर्म हो तुम.. भय व्याकुलता के मध्य में , विरह ना जाने क्या करे.. आदि अंत सिर्फ एक सत्य , उसके मध्य का धर्म हो तुम.. हर बूँद की धारिणी एक नदी , या विस्तृत नीला आकाश हो तुम , विचरण भरी अलसाई दुपहर , या रात्रि का शांत प्रवास हो तुम.. परिवर्तन की इस आंधी में , वर्तमान जाने कहाँ मुड़े.. पर सत्य शक्ति से उज्वलित , भविष्य का इतिहास हो तुम.

प्रेम (रहित) कहानी

Image
"एक कहानी .. सिर्फ एक कहानी लिख दो जिसमें इंजीनियरिंग कॉलेज और प्यार न हो.. " ये एक अनुरोध नहीं एक चुनौती थी.. और मैंने इस चुनौती को कतई स्वीकार नहीं किया.. पर हर बार कुछ लिखने बैठा तो प्रेम स्याही के रंग में उमड़कर कागज़ पर बिखर ही जाता था.. तो सोचा मैंने, चलो इस बार .. लिखें कुछ ऐसा कि जिसमे कहानी तो हो परन्तु प्रेम कतई ना हो... आप समझ रहे हो ना , कि मैं किसी मुश्किल काम के बारे में बात कर रहा हूँ.. खैर वैसे भी प्रेम मात्र अस्सी प्रतिशत फुटेज लेता था मेरी कहानियों की... बाकी बीस प्रतिशत तो कुछ और होता है ना.. अफ़सोस बाकी बीस प्रतिशत इंजीनियरिंग कॉलेज है... छि: !!!! विषयों का ऐसा अकाल.. चलो एक कहानी लिखते है... पहली बात तो ये कहानी किसी इंजीनियरिंग कॉलेज से शुरू नहीं होती... ना ना मेडिकल कॉलेज भी नहीं.. (लो !!! मेरी पारंपरिक कहानियों में २० फ़ीसदी बदलाव तो सिर्फ एक लाइन लिख के ही आ गया..) तो कहानी है चार लडको की... (लो ख़त्म.. प्रेम का स्कोप ही नहीं रखो कहानी में..) पर चार लड़कों की कहानी... ????? मजा नहीं आएगा पढने में किसी को.. मैं क्या कोई प्रेमचंद हूँ कि दो...

एक किस्सा (५).. सिर्फ़ चार साल...

"चार साल.. चार साल तुम्हे लगता है, कम होते हैं...?" "........................................" "आखिर समझता क्या है यार वो.. मैं बुरी हूँ क्या ? " "क्या हुआ कुछ बताओगी ?" "कुछ नहीं.." उसने रुमाल से आंसू पोंछे और हलकी डबडबायी आँखों से बोला.. " मेरी ही गलती है.. मुझे चार साल पहले ही संभल जाना चाहिए था..." "कुछ बताओगी.. या खुद ही फैसले करती रहोगी... क्या हुआ?" "अच्छा छोड़ ना ... रहने दे... तू बता.. तू ऐसे तो कभी फ़ोन नहीं करता.. आज क्यूँ किया..?" कोई २० दिन हुए होंगे मुझे अंजलि को जाने हुए... ये पहली बार "तू" था.. शायद किसी का सबसे पहला "तू" संबोधन था ये... मैं चुप ही बैठा रहा... खाना टेबल पे लग चुका था.. वो भी थोडी देर तक जाने क्या सोचती रही... "फर्स्ट इयर में मैंने अपने एक दोस्त को बताया था कि मुझे गौरव सर पसंद हैं.. उसने जाके गौरव को बता दिया.. गौरव ने उसे बोला.. कि मुझे इन सब बातो से कोई मतलब नहीं है.. मेरी मंजिल ये प्यार मोहब्बत के अलावा और कुछ है.... मुझे तभी समझ जाना चाह...

एक किस्सा (४) : दिल चाहता है..

पहली किश्त दूसरी किश्त तीसरी किश्त "सुबोध... तुम्हे टाइम याद नहीं है ? " "ऑफ कोर्स याद है , ठीक पाँच बजकर पचपन मिनट हुए थे.." कुछ याद आया ? ये "दिल चाहता है" नाम की एक फिल्म में दोहराया गया संवाद है.. सुबोध नाम के किसी शख्स की मेरे जीवन में एंट्री से बहुत पहले सुबोध नाम की मेरी दिमाग में एक छवि बन चुकी थी.. सधन्यवाद फरहान अख्तर कृत "दिल चाहता है" के किरदार सुबोध की वजह से... अब जिन लोगों ने ये फिल्म नहीं देखी हो उनकी जानकारी के लिए बता दूँ कि सुबोध "दिल चाहता है" का वो किरदार है , जिसे Tag Heuer, Omega, या Rolex के सस्ते विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है... इनकी इसी खूबी की वजह से इनका नाम "टाइम टेबल" भी है...ये साधारण जीवन की असाधारण तरीके से ऐसी तैसी करने में लगे रहते हैं .. सुबह पाँच बजे उठके योगा, मोर्निंग वाक्, वगैरह वगैरह.. यहाँ तक कि रविवार को भी उनकी दिनचर्या तय है... खैर जब मुझे रीवा के तथाकथित boyfriend का नाम पता चला, तो दिल को एक सुकून सा मिला. सुबोध... :) ना तो रीवा पूजा थी ना मैं समीर... पर जाने क...

एक किस्सा ...तृतीय भाग..

पहली किश्त दूसरी किश्त आज सोचता हूँ तो अजीब सा लगता है... सिर्फ खूबसूरती अगर किसी बात का पैमाना होती मेरी नजर में, तो जाने कितने मापतोल यूँ ही आदर्शों की लकीरों पे इस तरह न बिखरे होते... और बात सिर्फ लड़कियों की नहीं हैं.. किसी की भी.. मुझे कभी वो पहलू समझ नहीं आया, जिसके आधार पर मैं किसी को अपने करीब आने देता हूँ... रीवा को उस दिन रेलवे स्टेशन पर देखने से बहुत पहले, कभी कभी तो लगता है कि उसका नाम सुनने से भी बहुत-बहुत पहले मैं उसे जानने लगा था... वो एक अजीब पागलपन होता है.. जो प्यार नहीं होता... क्यूंकि प्यार जैसे शब्द भी आप नहीं सोचते उस वक़्त.. वो कोई जिद्द नहीं होती.. क्यूंकि उसे पाने की इच्छा नहीं होती... वो आकर्षण भी नहीं होता क्यूंकि कई बार तो उसे देखा भी नहीं होता..."रीवा" कुछ नहीं होती..मगर सब कुछ होती है... और कभी कभी ताउम्र सब कुछ रहती है.... अगर कोई "रीवा" आपके जीवन में कभी आई हो तो आप समझोगे कि क्यूँ एक राजकुमारी मीराबाई नाम से जगविख्यात होती है... भगवान से तुलना भी नहीं कोई उसकी... क्यूंकि "रीवा" की कोई तुलना नहीं होती... और जैसे कबीर क...

एक किस्सा - भाग २

पहली किश्त मानता हूँ कि पहली मुलाकात हमेशा सही तथ्य प्रस्तुत कर सके , ये आवश्यक नहीं .. परन्तु पहली मुलाकात में कुछ ऐसी चीजे छुपी होती हैं .. जो आपके सामंजस्य की दिशा निर्धारित करती हैं .. अंजलि और मैंने साथ साथ ही कंपनी ज्वाइन की थी . हम कोई बीस या बाईस लोग थे जिन्होंने साथ में ज्वाइन किया था .. उस पूरे बैच में एकलौता अक्लमंद राकेश ही था शायद .. बाकि सब मेरी ही तरह थे . जिन्हें अच्छे परिणाम तभी मिलते हैं जब वो कोई मेहनत नहीं करते .. और जहाँ मेहनत कर बैठे वहाँ कुछ तो ऐसा होता है कि जितनी मेहनत परिणाम पाने के लिए की हो , उससे ज्यादा मेहनत उस परिणाम को भुलाने के लिए करनी पड़ती है .. मैं रीवा को भुलाने की मेहनत आज भी कर रहा हूँ शायद .. खैर .. शुरू के कुछ दिनों में हमें कंपनी के बारे में बताया गया .. कंपनी का इतिहास इस तरह बताया गया कि मुझे ऐसा महसूस हुआ कि 1857 की लड़ाई में हारने के बाद से जैसे सारे भारतीय इसी नेक काम में लगे रहे और ...