तुम भाग-३
स्वप्न सी अविश्वसनीय सही , पर परिचित एक यथार्थ हो तुम , मेरा स्वयं हो अक्सर , तो कभी सिर्फ मेरा स्वार्थ हो तुम.. कारण नहीं किसी परिवर्तन का , या फिर किसी समर्पण का , पर फिर भी भक्तिभाव हो तुम , जीवन का परमार्थ हो तुम.. खुद से खुद की आस्था , या विश्वास भरा एक भ्रम हो तुम. सुर्ख दहकती ताप सी , या आँसू सी नर्म हो तुम.. भय व्याकुलता के मध्य में , विरह ना जाने क्या करे.. आदि अंत सिर्फ एक सत्य , उसके मध्य का धर्म हो तुम.. हर बूँद की धारिणी एक नदी , या विस्तृत नीला आकाश हो तुम , विचरण भरी अलसाई दुपहर , या रात्रि का शांत प्रवास हो तुम.. परिवर्तन की इस आंधी में , वर्तमान जाने कहाँ मुड़े.. पर सत्य शक्ति से उज्वलित , भविष्य का इतिहास हो तुम.