एक किस्सा (५).. सिर्फ़ चार साल...
"चार साल.. चार साल तुम्हे लगता है, कम होते हैं...?" "........................................" "आखिर समझता क्या है यार वो.. मैं बुरी हूँ क्या ? " "क्या हुआ कुछ बताओगी ?" "कुछ नहीं.." उसने रुमाल से आंसू पोंछे और हलकी डबडबायी आँखों से बोला.. " मेरी ही गलती है.. मुझे चार साल पहले ही संभल जाना चाहिए था..." "कुछ बताओगी.. या खुद ही फैसले करती रहोगी... क्या हुआ?" "अच्छा छोड़ ना ... रहने दे... तू बता.. तू ऐसे तो कभी फ़ोन नहीं करता.. आज क्यूँ किया..?" कोई २० दिन हुए होंगे मुझे अंजलि को जाने हुए... ये पहली बार "तू" था.. शायद किसी का सबसे पहला "तू" संबोधन था ये... मैं चुप ही बैठा रहा... खाना टेबल पे लग चुका था.. वो भी थोडी देर तक जाने क्या सोचती रही... "फर्स्ट इयर में मैंने अपने एक दोस्त को बताया था कि मुझे गौरव सर पसंद हैं.. उसने जाके गौरव को बता दिया.. गौरव ने उसे बोला.. कि मुझे इन सब बातो से कोई मतलब नहीं है.. मेरी मंजिल ये प्यार मोहब्बत के अलावा और कुछ है.... मुझे तभी समझ जाना चाह...