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वो मिट्टी

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वो मिट्टी पुकारती है , वो ज़मीन बुलाती है ; जीते मरते हर पल , मुझे तेरी याद आती है ; कुछ साँसे थम सी गयी हैं, तुझसे जुदा होकर , तुझसे मिलने की ख्वाहिस, एक जिंदगी दे जाती है; वो मन्दिर की घंटी , वो मस्जिद की अजान, वो किताबों में कहीं , वो गीता और कुरान , मैं देखता हूँ ,आजकल सोते जागते हर जगह , वो होता महाभारत , वो कन्हैया की मुस्कान ; है एक यही ख्वाहिश , है एक यही आरजू ; वो बिखरती रेत और वो मिट्टी की खुशबू ; मैं छूना चाहता हूँ , तुझे एक बार फ़िर से ; यही है मकसद अब , यही मेरी जुस्तजू ; - पंकज बसलियाल ( १३ जनवरी २००८ , स्वदेस देखने के बाद )

मैं खुश हूँ

http://kavita.hindyugm.com/2008/01/blog-post_9527.html?showComment=1200408480000 जी , मैं खुश हूँ . आपने सही सुना , कि मैं खुश हूँ . शायद आज किसी को रोते नहीं देखा , नंगे बदन फ़ुटपॉथ पर सोते नहीं देखा , शायद रिश्तों की कालिख छुपी रही आज, तो किसी को टूटी माला पिरोते नहीं देखा. आज भी भगवान को किसी की सुनते नहीं देखा, पर हाँ, आज किसी के सपनों को लुटते नहीं देखा, तन्हा नहीं देखा , किसी को परेशान नहीं देखा, पाई पाई को मोहताज, सपनों को घुटते नहीं देखा. बैचैनी नहीं दिखी, कहीं मायुसी नजर ना आयी , कहीं कुछ गलत होने की भी कोई खबर ना आयी, सब कुछ आज वाकई इतना सही क्यों था आखिर, कि दर्द ढूंढती मेरी निगाहें कहीं पे ठहर ना पायी . मैं खुश हूं वाकई, पर कुछ हो जाने से नहीं कुछ ना हो पाने से खुश हूँ कुछ पाने से नहीं किसी के जाने से खुश हूँ, किसी के आने से नहीं किसी के रूठ जाने से, किसी के मनाने से नहीं पर ये खुशी की खनक मेरे आस पास ही थी, कई अनदेखी आँखें आज भी उदास ही थी, मैनें कुछ नहीं देखा, का मतलब खुशहाली तो नहीं मेरे अकेले की खुशी, एक अधूरा अहसास ही थी.. वो दिन आयेगा शाय...

सफ़र की मज़बूरी... या सिर्फ़ मज़बूरी का सफ़र???

न्यूयॉर्क में सर्दियाँ शुरू हो गयी हैं। तेज भागती यहाँ की ज़िन्दगी में आने वाले समय की परछाई साफ़ नज़र आने लगी है. आने वाले समय का ठहराव दिखने लगा है. काफ़ी समय बाद आज सोच रहा हूँ कि यहाँ के अपने अब तक के अनुभवों को लिखा जाये. आज से कोई ६ या ७ हफ़्तों पहले जब नेवार्क एअरपोर्ट पर उतरा था, तो एक धुकधुकी सी थी मन के किसी कोने में, मुझे रत्ती भर भी अन्दाजा नहीं था कि ज़िन्दगी कितनी अलग हो सकती है यहाँ पर, एअरपोर्ट पर उतरा तो एक अफ़्रिकन टैक्सीवाले ने मुझसे पूछा -"यू नीड ए टैक्सी ?". मैनें उसे अपने गन्तव्य के विषय में बताया तो उसने कहा "फ़ोर्टी फ़ाइव डॉलर.." इससे पहले मैं उससे कुछ कह पाता कि एक आवाज ने मेरा ध्यान अपनी और खींचा " जर्सी सिटी जाना है क्या? " बात हिन्दी में पूछी गयी थी, तो बताने की जरूरत नहीं कि मैंने कौन सी टैक्सी ली होगी । मुझे आश्चर्य हो रहा था कि मैंने ऐसा क्यों किया ?, सिर्फ़ १८ घन्टे के सफ़र ने मुझे भाषावादी और क्षेत्रवादी बना दिया. न्यूयॉर्क की धरती पर मेरा लिया हुआ पहला निर्णय था ये वो भी भाषावादिता की परिधि में। खैर, एक बात है...भारत औ...