वो मिट्टी
वो मिट्टी पुकारती है , वो ज़मीन बुलाती है ; जीते मरते हर पल , मुझे तेरी याद आती है ; कुछ साँसे थम सी गयी हैं, तुझसे जुदा होकर , तुझसे मिलने की ख्वाहिस, एक जिंदगी दे जाती है; वो मन्दिर की घंटी , वो मस्जिद की अजान, वो किताबों में कहीं , वो गीता और कुरान , मैं देखता हूँ ,आजकल सोते जागते हर जगह , वो होता महाभारत , वो कन्हैया की मुस्कान ; है एक यही ख्वाहिश , है एक यही आरजू ; वो बिखरती रेत और वो मिट्टी की खुशबू ; मैं छूना चाहता हूँ , तुझे एक बार फ़िर से ; यही है मकसद अब , यही मेरी जुस्तजू ; - पंकज बसलियाल ( १३ जनवरी २००८ , स्वदेस देखने के बाद )