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अक्तूबर २००२

मैं असीम अनंत और अपराजेय का, बन न पाऊं कभी विकास | हो सके प्रभु, गर तेरे बस में, कर दे जीवनशक्ति का विनास | मैं झूलता रहूँ कुपित सृष्टिपथ पर, न न्योछावर हो जाऊं किसी शपथ पर, कभी न चलूँ अब इस ज़मीन पर, कर दे सवार मुझे मृत्युरथ पर, अपनी अक्षमता और अविवेक का, हो न पाए कभी ह्रास | हो सके प्रभु, गर तेरे बस में, कर दे जीवनशक्ति का विनास | मैं अब्रह्माण्ड की माया का जालभुक्त न बनू कभी, एक एक कर तोड़ दे, साथ मेरे हैं जो सभी, लोभी बन जाऊं प्रलोभ का, जी ना पाऊं चैन से, मृत्यु आ अंक लगा, और वरन कर मेरा अभी| भूत मेरा खो चुका और भविष्य बना दे तू इतिहास | हो सके प्रभु, गर तेरे बस में, कर दे जीवनशक्ति का विनास |