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Showing posts from October, 2009

एक किस्सा ...तृतीय भाग..

पहली किश्त दूसरी किश्त आज सोचता हूँ तो अजीब सा लगता है... सिर्फ खूबसूरती अगर किसी बात का पैमाना होती मेरी नजर में, तो जाने कितने मापतोल यूँ ही आदर्शों की लकीरों पे इस तरह न बिखरे होते... और बात सिर्फ लड़कियों की नहीं हैं.. किसी की भी.. मुझे कभी वो पहलू समझ नहीं आया, जिसके आधार पर मैं किसी को अपने करीब आने देता हूँ... रीवा को उस दिन रेलवे स्टेशन पर देखने से बहुत पहले, कभी कभी तो लगता है कि उसका नाम सुनने से भी बहुत-बहुत पहले मैं उसे जानने लगा था... वो एक अजीब पागलपन होता है.. जो प्यार नहीं होता... क्यूंकि प्यार जैसे शब्द भी आप नहीं सोचते उस वक़्त.. वो कोई जिद्द नहीं होती.. क्यूंकि उसे पाने की इच्छा नहीं होती... वो आकर्षण भी नहीं होता क्यूंकि कई बार तो उसे देखा भी नहीं होता..."रीवा" कुछ नहीं होती..मगर सब कुछ होती है... और कभी कभी ताउम्र सब कुछ रहती है.... अगर कोई "रीवा" आपके जीवन में कभी आई हो तो आप समझोगे कि क्यूँ एक राजकुमारी मीराबाई नाम से जगविख्यात होती है... भगवान से तुलना भी नहीं कोई उसकी... क्यूंकि "रीवा" की कोई तुलना नहीं होती... और जैसे कबीर क...

एक किस्सा - भाग २

पहली किश्त मानता हूँ कि पहली मुलाकात हमेशा सही तथ्य प्रस्तुत कर सके , ये आवश्यक नहीं .. परन्तु पहली मुलाकात में कुछ ऐसी चीजे छुपी होती हैं .. जो आपके सामंजस्य की दिशा निर्धारित करती हैं .. अंजलि और मैंने साथ साथ ही कंपनी ज्वाइन की थी . हम कोई बीस या बाईस लोग थे जिन्होंने साथ में ज्वाइन किया था .. उस पूरे बैच में एकलौता अक्लमंद राकेश ही था शायद .. बाकि सब मेरी ही तरह थे . जिन्हें अच्छे परिणाम तभी मिलते हैं जब वो कोई मेहनत नहीं करते .. और जहाँ मेहनत कर बैठे वहाँ कुछ तो ऐसा होता है कि जितनी मेहनत परिणाम पाने के लिए की हो , उससे ज्यादा मेहनत उस परिणाम को भुलाने के लिए करनी पड़ती है .. मैं रीवा को भुलाने की मेहनत आज भी कर रहा हूँ शायद .. खैर .. शुरू के कुछ दिनों में हमें कंपनी के बारे में बताया गया .. कंपनी का इतिहास इस तरह बताया गया कि मुझे ऐसा महसूस हुआ कि 1857 की लड़ाई में हारने के बाद से जैसे सारे भारतीय इसी नेक काम में लगे रहे और ...