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Showing posts from March, 2008

इन्सान वाकई बेहतर है...

कुछ लोग कहते हैं कि हर दिन के समापन के साथ सिर्फ़ इस बात का महत्व है कि दिन के अन्तिम क्षणों में आप खुश हैं या नहीं .. कुछ लोग ये भी मानते हैं कि हर हाल में खुश रहना आपके ऊपर निर्भर करता है.. दुःख को कुछ लोग खोखला भी मान सकते हैं.. क्योंकि ऐसे लोग दुःख की तीक्ष्णता में यकीन रखते हैं.. मुझे कोई गुरेज नहीं अगर आप ये तुलना करना चाहते हों कि किसे ज्यादा दुःख होगा.. उसे जो सड़क के किनारे भूखे पेट सोया है या फ़िर उसे जिसने किसी वजह से अपना हाथ खो दिया है और उसके पास कमाने का कोई साधन नहीं है.. आपको तुलना करनी है आप करिये.. मुझे दुःख की तीक्ष्णता से कहीं ज्यादा अफ़सोस दुःख की उपस्तिथि का है॥ हम सभ्यता के सिंधु में गोते लगाते हुए कितने आत्म-सम्मान के साथ ये बात महसूस करते हैं कि मनुष्य जानवरों से कितना बेहतर है.. पर ज़रा सोचिये वो सोच अपने आप में कितना वजन रखती है जिसने मनुष्य को जानवर के साथ तुलना के लायक तो सिद्ध कर दिया.. क्या फर्क पडा अगर मनुष्य बेहतर साबित हुआ.. तुलना तो जानवर से ही हुयी... डायनासौर इस धरती से विलुप्त हो गए.. कभी आपको ये सोच कर दुःख होता है.. ? क्यों .. क्यों नहीं होता है.. ...

मेरी दैनंदिनी - अन्तिम भाग

१६ मार्च २००८ क्या आप ये मानते हैं कि दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं जो आप नहीं कर सकते ? अगर नहीं तो फ़िर ये आपके पढ़ने के लिए नहीं लिखा जा रहा है॥ कभी कभी सदियों के सफर को एक पल में समेट लेना इतना भी मुश्किल नहीं होता है जितना कई बार हमें लगता है.. आज से तीन साल पहले जिंदगी पारुल और रोशनी के तराजू में झूल रही थी, फैसला तो मैं आज भी नही कर सकता कि उस वक्त मैं क्या चाह रहा था और मेरी सोच कितनी सही थी.... पर इन तीन वर्षों में मैंने एक चीज जानी है.. इन्सान की जिन्दगी ४ आवरणों से ढकी होती है ॥ पहली सतह उसका ख़ुद का सच होती है , उसकी मान्यताएं, उसके विश्वास , उसकी श्रद्धा , उसका समर्पण और उसका इंतजार ... ये सब मिला के उसकी पहली सतह का निर्माण करते हैं॥ जिसे कभी कभी हम लोग स्वार्थ की नजर से , कभी अहम् की नजर से देखते हैं... उसका दूसरा आवरण बनाती है उसका प्यार.. उस एक इन्सान का वजूद जो उसके अस्तित्व के कण कण में व्याप्त होता है ॥ तीसरा आवरण दोस्त , चाहत , खुशियों की इच्छा और हर उस चीज से बनता है जिसे इंसान अपना कहता है.. नाते रिश्ते, जन्म मृत्यु के बन्धन ,सुख चैन सब यहीं आकर निर्धारित होते हैं......

तुम भाग-२

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महक उठे मिट्टी भी , वो एक बरसात हो तुम, रोशन कर दे ज़र्रा ज़र्रा , पूनम की रात हो तुम, मेरे लिये वजह तो कभी कुछ थी ही नहीं मगर, जीता हूँ जिस जिसके लिये , वो हर बात हो तुम। खुशनुमा सुबह हो, या उससे पहले की सहर हो तुम, वक़्त हो पल भर का,या जीवन का हर प्रहर हो तुम, चाँद को कह तो दूँ , प्रतिमान सुन्दरता का मगर, चाँदनी की किस्मत पर , रूप का कहर हो तुम। सिर्फ एक मौसम हो , या पूरी बहार हो तुम, पहली खामोशी हो , या आखिरी पुकार हो तुम, लड़ने की आरज़ू हो, या मरने की हसरत हो, जीत हो किसी की ,या किसी की हार हो तुम। अहसास तुमको ना सही , किसी का अहसास हो तुम, दुनिया बदल दे जो, दिल की वो आवाज़ हो तुम, खुद की अहमियत से हो अन्जान, पर अब तो जान लो, कि सुरों की थिरकन हो , जीवन का साज हो तुम। क्षितिज हो किसी का, किसी का फलक हो, हंसने की वज़ह हो, खुशियों की झलक हो, अपने वज़ूद को समझने की कोशिश तो करो, लड़ने का इरादा हो तुम, जीत की ललक हो.

फ़िर जला गया कोई |

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अंधेरों भरी दुनिया में, एक सूरज दिखा गया कोई, सपनों की महफ़िल से, आधी रात जगा गया कोई चिंगारी भी ना बची थी, शमा भी पिघल चुकी मगर , जलती बुझती इस आग को, फ़िर जला गया कोई.