इन्सान वाकई बेहतर है...
कुछ लोग कहते हैं कि हर दिन के समापन के साथ सिर्फ़ इस बात का महत्व है कि दिन के अन्तिम क्षणों में आप खुश हैं या नहीं .. कुछ लोग ये भी मानते हैं कि हर हाल में खुश रहना आपके ऊपर निर्भर करता है.. दुःख को कुछ लोग खोखला भी मान सकते हैं.. क्योंकि ऐसे लोग दुःख की तीक्ष्णता में यकीन रखते हैं.. मुझे कोई गुरेज नहीं अगर आप ये तुलना करना चाहते हों कि किसे ज्यादा दुःख होगा.. उसे जो सड़क के किनारे भूखे पेट सोया है या फ़िर उसे जिसने किसी वजह से अपना हाथ खो दिया है और उसके पास कमाने का कोई साधन नहीं है.. आपको तुलना करनी है आप करिये.. मुझे दुःख की तीक्ष्णता से कहीं ज्यादा अफ़सोस दुःख की उपस्तिथि का है॥ हम सभ्यता के सिंधु में गोते लगाते हुए कितने आत्म-सम्मान के साथ ये बात महसूस करते हैं कि मनुष्य जानवरों से कितना बेहतर है.. पर ज़रा सोचिये वो सोच अपने आप में कितना वजन रखती है जिसने मनुष्य को जानवर के साथ तुलना के लायक तो सिद्ध कर दिया.. क्या फर्क पडा अगर मनुष्य बेहतर साबित हुआ.. तुलना तो जानवर से ही हुयी... डायनासौर इस धरती से विलुप्त हो गए.. कभी आपको ये सोच कर दुःख होता है.. ? क्यों .. क्यों नहीं होता है.. ...