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Showing posts from January, 2008

मेरी दैनंदिनी - ११

२६ मई २००५ जैसे ईश्वर अपनी सम्पूर्ण भक्ति को कहीं छुपाकर कहीं भाग जाना चाहता हो , आज पारुल का पलटकर मुझे देखना मेरे अन्दर कहीं कहीं वैसे ही भाव जगा गया । जाने क्यों स्वयम् की विवशता को दूसरे की आंखों में झाँककर देखने की इच्छा दिन पर दिन मुझे खींचती जा रही है । आज सिंहावलोकन का दौर है , हर दिन हर पल ये सोचने में बिताया जा रहा है कि पिछले चार साल में आख़िर किया क्या है?? आज वास्तव में सोचना चाहिऐ कि पिछले चार में किया क्या है ? हम यहाँ पर एक चार साल की डिग्री की खातिर आये थे परन्तु ये भी सच है कि हम यहाँ पर विशुद्ध सिर्फ एक डिग्री लेने की खातिर नहीं आये थे। यहाँ आने से पहले हमारे माता पिता ने हमारे जीवन - समर की बागडोर हमारे हाथों में देने से पहले एक बार जरूर सोचा होगा कि ना जाने क्या होगा ? हमारे बेटे या बेटियाँ क्या इस जीवन समर में जीत पाएंगे। आज से चार साल पहले हम सभी अपने जीवन की लड़ाई में उतर कर युद्ध का विगुल बजा चुकें हैं। आने वाला वक़्त तय करेगा कि हम यहाँ जीवित बचकर धरती के सुखों में रहेंगे या फिर वीरगति हमारा इंतजार कर रही है? इंजीनियरिंग कि पिछले चार वर्ष कर्मभूमि में बिताये श...

मेरी दैनंदिनी - १०

२४ मई २००५ अपने गम को गीत बनाकर गा लेना राग पुराना तेरा भी है मेरा भी एक खास दिन का इंतज़ार था मुझे , पर वो कभी मेरी जिंदगी में आया ही नहीं । आया है तो ये दिन जो तब भी आ सकता था अगर मैंने अपने शुभचिंतकों की बात मान ली होती , चाहे वो अंकित का पारूल को भूल जाने को कहना होता , चाहे दर्शन का इस अजीब से अहसास को चुनौती देना । कॉलेज में डायरी लिखवाने का वक़्त चल रहा है , प्रतिआक्रमण के इस दौर में प्रियंक की लिखी बातें भी पढ़ चुका हूँ । दर्शन और अंकित त्यागी क्या लिखेंगे मुझे पता है , आलोक , चौहान और आशीष से मुझे कुछ आश्चर्यजनक और अलग सा अच्छा या बुरा सुनने या पढ़ने को मिलेगा , ये उम्मीद भी नहीं । मानवेन्द्र , राजन और रजत बचे हैं , वो क्या कहेंगे देखते हैं। आज आने वाला दिन खास भी हो सकता है और आम भी । इस वक़्त सुबह के ५ बज रहे हैं , मैं लिख रहा हूँ । दुनिया की किसी बात का कोई ओर -छोर इस वक़्त मेरे पास नहीं है , क्यों लिख रहा हूँ ये तो नही मालूम पर लगता है लिखना था ये मालूम था मुझे। कल से आखिरी सेमेस्टर के पेपर शुरू हो रहे हैं , यानी ये कॉलेज छोड़ने की उलटी गिनती शुरू हो जायेगी कल से । यहाँ रुक...

मेरी दैनंदिनी - ९

२२ मई २००५ लिखना सिर्फ़ एक कमजोरी है , दुनिया से थककर , अपने से भागकर सिर्फ़ अपने को छूने भर की एक कोशिश है लिखना । और ये कोशिश वही लोग करते हैं जो ख़ुद को देख नहीं पा रहे होते। समय कितना बदल जाता है , दो साल पहले अगर परीक्षा से तीन दिन पहले तक मेरे हर विषय की २-३ यूनिट ना पूरी हुयी होती तो मैं शायद बहुत ही ज्यादा परेशान होता इस वक़्त । मगर आज पढाई शुरू भी नही की है फ़िर भी एक अजीब सी संतुष्टी है मन में । ये अनुभव नहीं है , इसे वक्त बदलना कहते हैं, आज परीक्षाओं की जरूरत ही नहीं है , आज परिणाम का भी इंतज़ार नहीं, आज तो परीक्षार्थी भी मैं ही और परीक्षक भी मैं स्वयम । खैर इस वक्त मुझे उन दो पृष्ठों की प्रतीक्षा है जो मेरे इस महाविद्यालय जीवन के प्रथम अहसास यानी मानसी ने मेरे लिए लिखें होंगे । अजीब बात है ना .. , मानसी से रिश्ता कभी रहा ही नही , पारुल से कभी बना ही नही , और रोशनी के साथ बनने की उम्मीद भी नहीं । फ़िर भी कैसी कैसी अजीब सी बातों का इंतजार है मुझे, और मेरा यही इंतजार मुझे आँखें बंद करके अपने अन्तर से एक सवाल करने पे मजबूर करता है । " क्या मेरे लिए मुक्ती सम्भव है ?? "

वो मिट्टी

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वो मिट्टी पुकारती है , वो ज़मीन बुलाती है ; जीते मरते हर पल , मुझे तेरी याद आती है ; कुछ साँसे थम सी गयी हैं, तुझसे जुदा होकर , तुझसे मिलने की ख्वाहिस, एक जिंदगी दे जाती है; वो मन्दिर की घंटी , वो मस्जिद की अजान, वो किताबों में कहीं , वो गीता और कुरान , मैं देखता हूँ ,आजकल सोते जागते हर जगह , वो होता महाभारत , वो कन्हैया की मुस्कान ; है एक यही ख्वाहिश , है एक यही आरजू ; वो बिखरती रेत और वो मिट्टी की खुशबू ; मैं छूना चाहता हूँ , तुझे एक बार फ़िर से ; यही है मकसद अब , यही मेरी जुस्तजू ; - पंकज बसलियाल ( १३ जनवरी २००८ , स्वदेस देखने के बाद )