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Showing posts from November, 2007

मेरी दैनन्दिनी 4

१० मार्च २००५ उस पर पहला पॄष्ठ.. नाम रोशनी शर्मा .. कौन है? क्या है? कहाँ है? कैसी है? नहीं जानता.. अगर जानता हूँ तो बस इतना कि कोई तो थी कभी.. जिसे आज तक मैं भूला नहीं हूँ.. कोई ऐसी जो शायद इस वक़्त मेरे अन्तर्द्वन्दों की एक वजह समाप्त कर सकती है.. मैं जानत्ता हूँ जो इस वक़्त मैं सोच रहा हूँ वो ना तो आदर्शों के दायरे में आता है और ना ही कृत्यों के दायरे में.. पर मेरे सामने सिर्फ़ एक यही रास्ता है पारूल की छाया से बाहर आने का.. खैर सच कहूँ तो एक वक़्त पर वो मुझे पसन्द थी .. कभी ये यकीन नहीं था कि कभी उसकी भेजी हुयी मेल पढ़ूँगा.. और आज हसरत ये है कि दिल के किसी कोने में एक खयाल पनपने लगा है, कि क्या हो अगर वो जीवन में वापस आ जाये.. कौन जाने भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है पर फ़िर भी जिस उलझन से मैं पिछले तीन सालों से निकलना चाह रहा हूँ शायद रोशनी इसवक़्त इकमात्र रास्ता है...

मेरी दैनन्दिनी 3

२२ फरवरी २००५ एक और रात ... जो कुछ अधूरी सी लग रही है, जहँ वास्तव में कुछ सोचने की जरूरत पड़ रही है.. सोचता हूँ जब सब कुछ दाँव पर लगा दिया था, तब तो सब मूक बने देखते रहे ..फ़िर आज क्यों वही सब लोग पूछने लगे हैं " उस वक्त तुम्हें मुझसे मदद मांगनी चाहिये थी.. शायद मैं तुम्हरी मदद कर सकता था." यूं तो इस सवाल के कई निहितार्थ हो जाते हैं, पर ये उन लोगों की दोस्ती के वो अधूरे ज़ज़्बात हैं जिनके छलकने की जरूरत कभी थी ही नहीं .. आज भी नहीं... खैर आज मुझे एक बात पता है.. जिन्दगी सन्तुलन की अवस्था में है, जहाँ कोई आना चाहे तो संयोजित हो जायेगा और कोई जाना भी चाहे तो सहर्ष जा सकता है.. ऐ मेरे दोस्तों सच ये है कि.. ये मेरे ख्वाबों की दुनिया ना ही सही लेकिन, अब आ गया तो दो दिन कयाम करता चलूँ ..