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Showing posts from November, 2009

एक किस्सा (५).. सिर्फ़ चार साल...

"चार साल.. चार साल तुम्हे लगता है, कम होते हैं...?" "........................................" "आखिर समझता क्या है यार वो.. मैं बुरी हूँ क्या ? " "क्या हुआ कुछ बताओगी ?" "कुछ नहीं.." उसने रुमाल से आंसू पोंछे और हलकी डबडबायी आँखों से बोला.. " मेरी ही गलती है.. मुझे चार साल पहले ही संभल जाना चाहिए था..." "कुछ बताओगी.. या खुद ही फैसले करती रहोगी... क्या हुआ?" "अच्छा छोड़ ना ... रहने दे... तू बता.. तू ऐसे तो कभी फ़ोन नहीं करता.. आज क्यूँ किया..?" कोई २० दिन हुए होंगे मुझे अंजलि को जाने हुए... ये पहली बार "तू" था.. शायद किसी का सबसे पहला "तू" संबोधन था ये... मैं चुप ही बैठा रहा... खाना टेबल पे लग चुका था.. वो भी थोडी देर तक जाने क्या सोचती रही... "फर्स्ट इयर में मैंने अपने एक दोस्त को बताया था कि मुझे गौरव सर पसंद हैं.. उसने जाके गौरव को बता दिया.. गौरव ने उसे बोला.. कि मुझे इन सब बातो से कोई मतलब नहीं है.. मेरी मंजिल ये प्यार मोहब्बत के अलावा और कुछ है.... मुझे तभी समझ जाना चाह...

एक किस्सा (४) : दिल चाहता है..

पहली किश्त दूसरी किश्त तीसरी किश्त "सुबोध... तुम्हे टाइम याद नहीं है ? " "ऑफ कोर्स याद है , ठीक पाँच बजकर पचपन मिनट हुए थे.." कुछ याद आया ? ये "दिल चाहता है" नाम की एक फिल्म में दोहराया गया संवाद है.. सुबोध नाम के किसी शख्स की मेरे जीवन में एंट्री से बहुत पहले सुबोध नाम की मेरी दिमाग में एक छवि बन चुकी थी.. सधन्यवाद फरहान अख्तर कृत "दिल चाहता है" के किरदार सुबोध की वजह से... अब जिन लोगों ने ये फिल्म नहीं देखी हो उनकी जानकारी के लिए बता दूँ कि सुबोध "दिल चाहता है" का वो किरदार है , जिसे Tag Heuer, Omega, या Rolex के सस्ते विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है... इनकी इसी खूबी की वजह से इनका नाम "टाइम टेबल" भी है...ये साधारण जीवन की असाधारण तरीके से ऐसी तैसी करने में लगे रहते हैं .. सुबह पाँच बजे उठके योगा, मोर्निंग वाक्, वगैरह वगैरह.. यहाँ तक कि रविवार को भी उनकी दिनचर्या तय है... खैर जब मुझे रीवा के तथाकथित boyfriend का नाम पता चला, तो दिल को एक सुकून सा मिला. सुबोध... :) ना तो रीवा पूजा थी ना मैं समीर... पर जाने क...