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Showing posts from August, 2007

मुझे चाँद चाहिये : Platonic love

बहुचर्चित वेबसाईट " विकीपीडिया " पर प्लेटोनिक प्रेम की परिभाषा कुछ इस तरह से दी गयी है; Platonic love in its modern popular sense is a non-sexual affectionate relationship, especially in cases where one might easily assume otherwise. A simple example of platonic relationships is a deep, non-sexual (i.e. overtly romantic) friendship, not subject to gender pairings and not excluding close relatives. प्लेटोनिक प्रेम ......... ये शब्द हमेशा दिल में कहीं कौंधता रहा है मेरे। और अक्सर मैंने कोशिश की है, कि आखिर मैं समझ सकूँ प्रेम के उस अनुपम रूप को जिसकी व्याख्या कर पाना हर लेखक के लिये हमेशा असम्भव सा रहा है। जगजीत सिहं की गज़ल " शायद मैं ज़िन्दगी कि सहर " की चार पंक्तियाँ शायद प्लेटोनिक प्रेम की सही ढंग से व्याख्या कर पायी हैं । "ताउम्र ढूंढता रहा मंजिल मैं इश्क़ की , अन्जाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया। " इसी कड़ी में कुछ वर्ष पहले सुरेन्द्र वर्मा जी का उपन्यास " मुझे चाँद चाहिये" पढ़ा था । और उस एक उपन्यास ने मुझे विश्वास करने पे मज़बूर क...

नफरत है मुझे

नफरत है मुझे, ज़िन्दगी के उन अहसासों से. जो पल पल मुझे यकीन दिलाते हैं, कि मैं हर कदम एक झूठ के साये में चल रहा हूँ. ये जीवन एक मिथ्या के अलावा अगर कुछ है,तो मैं उस पहलु को छूना चाहता हूँ. और शायद इसीलिये मैं कब से भटक रहा हूँ काल के चक्रव्युह में. मुझे खुद नहीं पता कि इस सफर की मंजिल कहाँ है. क्या पता मेरा ये सफर एक अच्छे मुकाम पे पहुँच सके. क्या पता मेरी आखिरी साँस एक सच के साये में आकार ले पाये, शायाद सबसे विशाल सत्य आखिरी सत्य हो ;