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Showing posts from December, 2007

मेरी दैनंदिनी -८

२० मई २००५ वक़्त बदलता है , तो हालात भी बदल जाते हैं। और बदलते हालातों में आख़िर इन्सान भी बदलने लगते हैं। पर दुनिया की इन तमाम बदलती चीजों में जो चीज नहीं बदलनी चाहिए , वो ना प्यार है न भरोसा और ना ही उम्मीदें , वो एक चीज सिर्फ और सिर्फ दोस्ती होनी चाहिऐ॥ सच में दोस्ती हर चीज, हर आशंका, हर संभावना, हर इरादों से परे होनी चाहिऐ। राज की बातें पता नहीं क्यों मुझे कुछ अजीब सा अहसास दिलाती हैं, पर राज , सच कहूँ अगर तुम्हें लगता है की मैंने तुम्हारे लिए या फिर तुमने मेरे लिए कुछ किया है तो तुम्हे गलत लगता है दोस्त । खैर तुम्हें क्या कहूँ मैं खुद दोस्ती की इन्हीं उलझनों में उलझा हूँ , मुझे खुद लगता है की मैंने काफी किया है अंकित के लिए और उससे ज्यादा शायद अंकुर ने मेरे लिए किया हो॥ पर वक़्त का फेर देखो और मेरी जगह खड़े होकर देखो , क्या अंकुर क्या अंकित और क्या मैं... हर कोई एक दूसरे के लिए मतलब खो चुका है दोस्ती तो ईश्वर ही जाने कहाँ रह गयी। खैर कुछ अच्छी बातों में शायद ये है कि हम में से किसी ने शायद किसी को कुछ नहीं जताया । मेरी खुदगर्जी कह लो या फिर मेरी अहसानफरामोशी , आज तक शायद मेरी दोस्त...

मैं खुश हूँ

http://kavita.hindyugm.com/2008/01/blog-post_9527.html?showComment=1200408480000 जी , मैं खुश हूँ . आपने सही सुना , कि मैं खुश हूँ . शायद आज किसी को रोते नहीं देखा , नंगे बदन फ़ुटपॉथ पर सोते नहीं देखा , शायद रिश्तों की कालिख छुपी रही आज, तो किसी को टूटी माला पिरोते नहीं देखा. आज भी भगवान को किसी की सुनते नहीं देखा, पर हाँ, आज किसी के सपनों को लुटते नहीं देखा, तन्हा नहीं देखा , किसी को परेशान नहीं देखा, पाई पाई को मोहताज, सपनों को घुटते नहीं देखा. बैचैनी नहीं दिखी, कहीं मायुसी नजर ना आयी , कहीं कुछ गलत होने की भी कोई खबर ना आयी, सब कुछ आज वाकई इतना सही क्यों था आखिर, कि दर्द ढूंढती मेरी निगाहें कहीं पे ठहर ना पायी . मैं खुश हूं वाकई, पर कुछ हो जाने से नहीं कुछ ना हो पाने से खुश हूँ कुछ पाने से नहीं किसी के जाने से खुश हूँ, किसी के आने से नहीं किसी के रूठ जाने से, किसी के मनाने से नहीं पर ये खुशी की खनक मेरे आस पास ही थी, कई अनदेखी आँखें आज भी उदास ही थी, मैनें कुछ नहीं देखा, का मतलब खुशहाली तो नहीं मेरे अकेले की खुशी, एक अधूरा अहसास ही थी.. वो दिन आयेगा शाय...

मेरी दैनंदिनी -७

१७ मई २००५ दुनिया में आपके लिए सिर्फ एक सच होता है , और वो सच बाक़ी सब चीजों से बड़ा होता है । लेकिन हाँ , कभी कभी कुछ एक बातें होती हैं जो हर सच, हर भरोसे से बड़ी होती हैं । और ऎसी ही एक बात को उसका अंत दिखाकर आया हूँ आज । प्यार सिर्फ एक अहसास होता है , जिसे जैसा आप समझते हैं , जरूरी नहीं कि दुनिया भी वैसा ही समझे । लेकिन इस आपाधापी में अगर कोई आप को समझे या फिर आपको समझने की कोशिश करे तो शायद इससे ज्यादा ख़ुशी कोई और आपको कभी दे नहीं पाएगा । पारुल , तुम्हें मैंने इस कॉलेज में सबसे ज्यादा इज्ज़त की नज़रों से देखा है । यूं तो कभी किसी के प्रभाव में खुद को खोने नहीं दिया पर तुम्हे देखकर खुद का आभास ही नहीं हुआ कभी मुझे । जाने कब कौन सी बात थी , जो तुम मेरे लिए प्रेरणा बन गयी । ऎसी प्रेरणा जो हर वक़्त मेरे साथ थी । मेरे अच्छे या मेरे बुरे वक़्त में भी जो कहीं ना कहीं मुझे एक अच्छा इंसान बने रहकर अपना धैर्य नहीं खोने देत...

मेरी दैनंदिनी - ६

२० अप्रैल २००५ farewell हो चुकी है, सिर्फ दो या तीन कदम और चलना है और पीछे मुड़ने के सारे रास्ते बंद हो जायेंगे सच कहूँ तो यहाँ आकर महसूस होता है कि कुछ भी हुआ होता पिछले चार सालों में ... आज यहाँ आकर हर बात हमे संतुष्टि ही देती ॥ आज सच में ख़ुशी इस बात की है कि मैंने अपने अंतर में कुछ खोया नहीं , या यूं कह लो कि अपने हाथों से कभी कुछ लुटाया नहीं । पर हाँ, इतना जरूर है कि जो चाहा कभी वो पाया नहीं, और जो मेरे हिस्से में आया वो कभी चाहा ही नहीं था । लोग पहले प्यार और दूसरे प्यार के बीच हमेशा एक बहस में उलझे रहते हैं , शायद पिछले कुछ समय से मैं भी उसी बहस में अपने आप को उलझा हुआ महसूस कर रहा हूँ । पहला प्यार या दूसरा प्यार , या फिर चाहे अन्तिम प्यार... मेरे लिए हर बार प्यार में पागलपन के अतिरिक्त अगर कुछ एक बात हमेशा समान रही है तो वो है हर बार प्यार का अधूरा रह जाना ॥ हर बार मेरे प्रेम को अधूरेपन की विमायें छूने पे जाने क्यों इतना मजबूर होना पड़ा। हर अधूरेपन की मदहोशी को मैंने जीते जागते महसूस किया है और हर बार मैं खुद से सिर्फ एक ही सवाल करता रह गया... " आख़िर मेरा हर प्यार इतना ब...

मेरी दैनंदिनी - ५

०५ अप्रैल २००५..... ख़ुशी ने आख़िर थोड़ा बहुत अपना मकाम बना ही लिया है मेरे जीवन में । सोचा नहीं था मगर आज मेरे आस पास कोई एक ऐसा है जिसकी नजर में मैंनें कोई गलती नहीं की । अब जबकि पारुल से एक बार बात हो चुकी है। चाहे हिसाब सही से लिए दिए ना गये हों , फिर भी इतना तो है कि मेरे अस्तित्व पे एक समय सवाल खड़ी करने वाली ने आज मेरी एक छोटी सी बात मान ली। कॉलेज लगभग ख़त्म हो चुका है , जूनियर्स ने फेयरवेल (विदाई समारोह) की तैयारीयाँ शुरू कर दी हैं. और इस समय मैं अपने आपको बंधनमुक्त महसूस कर रहा हूँ। स्वतंत्र ......... वास्तव में सच एक बहुत बड़ी चीज होती है पर उस सच से भी बड़ा होता है उसे भुना सकने का विश्वास । और शायद यही एक विश्वास होता है जो उस सच पे आपको यकीन करने को मजबूर कर देता है और शायद इंसान के हर बड़े दर्द की एक दवा बन जाता है ये विश्वास ॥ असल में बातें बहुत खुश होने वाली नहीं भी हों पर हम उन्हें बार बार सोच के अपनी खुशियों को बढाते रहना चाहते हैं और यही मैं इस वक़्त कर रहा हूँ । आठ दिन पहले पारुल से बात हुयी थी, और मैं ही जानता हूँ कि पिछले आठ दिनों में मेरे अन्दर किस भावना ने जन्म लि...