Posts

Showing posts from September, 2007

मेरी दैनन्दिनी

खुदा निगेहबान हो तुम्हारा, धड़कते दिल का पयाम ले लो. तुम्हारी दुनिया से जा रहे हैं , उठो हमारा सलाम ले लो. अपनी डायरी के कुछ पन्नों को सार्वजनिक करने का मन कर रहा है.. कोशिश करुँगा कि किसी को क्षति पहुँचाये बिना ये काम कर सकूँ... घटनाओं के विवरण वाले पृष्ठ कम से कम रहें , ऐसा मेरा प्रयास रहेगा... लोगों के नाम यथासम्भव समान रखने का प्रयास करूँगा पर आवश्यकता पड़ने पर छ्द्म नामों का सहारा लेना मेरी मज़बूरी रहेगी... इस सबके पीछे मेरी मंशा सिर्फ़ अपने आपको पहचानने की है.. किसी को ठेस पहुँचाने या नीचा दिखाने की कतई नहीं......

सफ़र की मज़बूरी... या सिर्फ़ मज़बूरी का सफ़र???

न्यूयॉर्क में सर्दियाँ शुरू हो गयी हैं। तेज भागती यहाँ की ज़िन्दगी में आने वाले समय की परछाई साफ़ नज़र आने लगी है. आने वाले समय का ठहराव दिखने लगा है. काफ़ी समय बाद आज सोच रहा हूँ कि यहाँ के अपने अब तक के अनुभवों को लिखा जाये. आज से कोई ६ या ७ हफ़्तों पहले जब नेवार्क एअरपोर्ट पर उतरा था, तो एक धुकधुकी सी थी मन के किसी कोने में, मुझे रत्ती भर भी अन्दाजा नहीं था कि ज़िन्दगी कितनी अलग हो सकती है यहाँ पर, एअरपोर्ट पर उतरा तो एक अफ़्रिकन टैक्सीवाले ने मुझसे पूछा -"यू नीड ए टैक्सी ?". मैनें उसे अपने गन्तव्य के विषय में बताया तो उसने कहा "फ़ोर्टी फ़ाइव डॉलर.." इससे पहले मैं उससे कुछ कह पाता कि एक आवाज ने मेरा ध्यान अपनी और खींचा " जर्सी सिटी जाना है क्या? " बात हिन्दी में पूछी गयी थी, तो बताने की जरूरत नहीं कि मैंने कौन सी टैक्सी ली होगी । मुझे आश्चर्य हो रहा था कि मैंने ऐसा क्यों किया ?, सिर्फ़ १८ घन्टे के सफ़र ने मुझे भाषावादी और क्षेत्रवादी बना दिया. न्यूयॉर्क की धरती पर मेरा लिया हुआ पहला निर्णय था ये वो भी भाषावादिता की परिधि में। खैर, एक बात है...भारत औ...