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कोई तो थी वो मेरी

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खोयी हुयी सी इन अंधेरों में, सिर्फ एक नाम सी लगती है, वो मेरे जैसे ही थी, पर दुनिया को बदनाम सी लगती है . आज मैं और वो कुछ नहीं एक दूजे के लिए भले ही , गीली रेत पे मगर कभी कभी, वो पैरों के निशान सी लगती है . वो मुस्कराती थी कभी कभी, मुझ पर बिजलियाँ गिराने को , वो मुस्कराती थी कभी मुझे जलाने को कभी मनाने को . वो किसी भी वजह से सही, वो मुस्कराती तो थी मगर , दुनिया को रास ना आ सकी , वो ऎसी मुस्कान लगती है.. मैं नहीं जानता कि आज फिर ये वही अफ़सोस क्यों है ? उसके आँसुओं के जवाब में, हर कोई खामोश क्यों है? वो मेरी बन ना पायी सब कुछ चाहकर भी और.. मैं ये ना बता पाया कि इसमें भी उसका दोष क्यों है? खोयी हुयी सी इन अंधेरों में, सिर्फ एक नाम सी लगती है, वो मेरे जैसे ही थी, पर दुनिया को बदनाम सी लगती है

किसी के ख्वाब किसी की ज़िन्दगी का अन्धेरा |

हिन्दुस्तान में हर लडकी अपने बचपन से एक ही ख्वाब देखते हुये जीती है कि एक दिन सफेद घोडे पर एक राजकुमार आयेगा और उसकी दुनिया बदल देगा वो सारी खुशियाँ उसके दामन में बिखेर देगा जो शायद इस पूरी कायनात में मौजूद ही नहीं हैं सच कहूँ लडकियों का क्या है सपने देखती हैं गुनाह तो नहीं करती पर ये गुनाह बन जाता है क्योंकि दुनिया में हर उस इन्सान को ये सपना पता होता है जो उसे हमेशा खुश देखना चाहता है और उसे खुश देख्नने के लिये वो उसका ये ख्वाब भी पूरा कर देना चाहता है और बस इस एक ख्वाब को हक़ीकत का आईना दिखाने के लिये वो बहुत कुछ भूल जाता है उसकी ज़िन्दगी का एक अहम दौर निकल जाता है वो राजकुमार बनने में जिसकी तमन्ना उसकी तमन्ना को है जो खुशियाँ मौजूद ही नहीं उन्हें खोजने वो निकल पडता है , और बदले में अपनी खुशियाँ लुटा बैठता है जो हौंसले दुनिया जीत सकते हैं वो एक अदना सी लडकी के आगे सब कुछ हार जाते हैं क्या कहे इसे ये दुनिया ही ऐसे बनायी गयी है , कि यहाँ अपने को जलाकर इन्सान दुसरे की सर्दी को आग दिखाना चाहता है... शायद मैं भी ... सब जानने के बावज़ूद भी...

सज़ा-ए-मौत

अरमान ना बचेंगे कोई , आरज़ू भी खो जायेगी, ना खुशी हँस पायेगी और ना ही रो पायेगी, मौत कहती है ... कि सज़ा मत कहो मुझे..., वर्ना इक दिन ज़िन्दगी बे-आबरू हो जायेगी. रोने की तमन्ना सिर्फ़ एक सपना बन जयेगा.., खुशियोँ की आन्धी में तेरा दम घुट जायेगा.., गमों से भागने की वजह तेरे पास है भले ही, पर ज़िन्दगी के साथ रहकर तू ज्यादा पछ्तायेगा.. तेरे अपने तुझे कब तक गले लगायेंगे.. रूठ जा तू हर बार शायद लोग मनायेंगे.. तू नादान है, समझता है रोज़ यही चलेगा.. पर देखना, इक दिन सारे रिश्ते बदल जायेंगे. तेरा तमाशा बनेगा और तू खुद पर ही हंसेगा.. और उस दिन तेरे साथ ये सारा ज़माना कहेगा.. ये जीना भी कोई जीना है भला.. मर जाने से बेहतर हाल मे आखिर तू कब तक रहेगा? यक़ीन ना आये अगर तो एक बर मुड़ के देख ले, सारी दुनिया को झुका ले या एक बार झुक के देख ले, अन्ज़ाम तेरा मैं खुद क्या कहुं तू जान लेगा.., वक़्त ज़्यादा दूर भी नहीं बस थोड़ रुक के देख ले. उस वक़्त जब ज़िन्दगी मौत से बद्तर हो जायेगी.. उस वक़्त जब खुशियाँ आ आकर रुलायेंगी, उस वक़्त जब हर कोई तुझे चहेगा और तू कुछ भी नहीं, उस वक़्त ...

तुम

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किसी के पागलपन की पहचान हो तुम, किसी की ज़िन्दगी का अरमान हो तुम, मुस्कराना भले ही कुछ ना हो तुम्हारे लिये, किसी की ज़िन्दगी की मुस्कान हो तुम. किसी की सबसे खूबसूरत रचना हो तुम, किसी की प्रथम और अन्तिम अर्चना हो तुम, ख़ुद को भले ही तुम कभी समझ ना सकी हो, पर किसी के लिये अधूरा अन्सुना सपना हो तुम. किसी के प्यार भरी नज़रों की कामना हो तुम, किसी के वर्षों की तमन्ना और साधना हो तुम, कहीं हो पूजा, कहीं हो दुआ, कहीं पे नेमत्त, कहीं प्रार्थना हो तुम. बर्फ़ से जल उठे जो, किसी की वो प्यास हो तुम, ईश्वर ही रह जाये जिसके बाद, वो आस हो तुम, चलना ज़रा आहिस्ता अपना वज़ूद समझकर, किसी टिमटिमाते दिये की आखिरी साँस हो तुम. ज़िन्दगी की शुरूआत ना सही, समापन तो हो तुम, किसी की मोहब्बत का एकमात्र समर्पण हो तुम, हजारों चेहरों में खोये इन चेहरों को गौर से देखो, किसी एक चेहरे के लिये जीवन का दर्पण हो तुम. - पंकज बसलियाल

वो क्या जाने पीर पराई !!

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वो क्या जाने पीर पराई !! दुनिया के दस्तूर थोडे अज़ीब ही हैं.... यहाँ चाहे कोई कुछ भी हो, अमीर चाहे गरीब, प्रबुद्ध चाहे मूर्ख, घमंडी कपटी चाहे धर्मात्मा .. पर सबके अन्दर थोडी बहुत जीने की चाह, थोडी खुशियोँ की हसरत, थोडा अच्छा करने की प्रेरणा आज भी बाकी है. मैं ये तो नहीं जानता कि हर इन्सान सिर्फ खुशियों की ही कामना क्यों करता है ? पर फिर भी इतना तो है कि मैं या तो सिर्फ खुशियों की कामना नहीं करता.. या फिर मैं सामान्य नहीं रहा... खैर जो भी हो मुझे भी बहुत सी बातों का इन्तज़ार है, शायद यही वो ज़ीने की चाह है, या खुशी की हसरत या फिर कुछ अच्छा करने की प्रेरणा.... या कहीं ये सिर्फ मेरा पागलपन ही हो... कौन जाने ?