प्रेम (रहित) कहानी

"एक कहानी .. सिर्फ एक कहानी लिख दो जिसमें इंजीनियरिंग कॉलेज और प्यार न हो.."

ये एक अनुरोध नहीं एक चुनौती थी.. और मैंने इस चुनौती को कतई स्वीकार नहीं किया.. पर हर बार कुछ लिखने बैठा तो प्रेम स्याही के रंग में उमड़कर कागज़ पर बिखर ही जाता था..
तो सोचा मैंने, चलो इस बार .. लिखें कुछ ऐसा कि जिसमे कहानी तो हो परन्तु प्रेम कतई ना हो...
आप समझ रहे हो ना, कि मैं किसी मुश्किल काम के बारे में बात कर रहा हूँ.. खैर वैसे भी प्रेम मात्र अस्सी प्रतिशत फुटेज लेता था मेरी कहानियों की... बाकी बीस प्रतिशत तो कुछ और होता है ना..
अफ़सोस बाकी बीस प्रतिशत इंजीनियरिंग कॉलेज है...
छि: !!!! विषयों का ऐसा अकाल.. चलो एक कहानी लिखते है...
पहली बात तो ये कहानी किसी इंजीनियरिंग कॉलेज से शुरू नहीं होती... ना ना मेडिकल कॉलेज भी नहीं.. (लो !!! मेरी पारंपरिक कहानियों में २० फ़ीसदी बदलाव तो सिर्फ एक लाइन लिख के ही आ गया..)
तो कहानी है चार लडको की... (लो ख़त्म.. प्रेम का स्कोप ही नहीं रखो कहानी में..)
पर चार लड़कों की कहानी...????? मजा नहीं आएगा पढने में किसी को.. मैं क्या कोई प्रेमचंद हूँ कि दो बैलों की कहानी भी लिख दूँ तो लोग पढेंगे..
सो मेरी कहानी में कम से कम एक लड़की का होना तो बनता है..
तो सब्जेक्ट थोडा चेंज करते हैं...
अभी एक लड़का है और एक लड़की है.. (गौरतलब ये है कि प्रेम नहीं है...)
साथ साथ पढ़ते हैं... नहीं नहीं (साथ साथ पढने से प्रेम हो जाने का खतरा बना रहेगा)...
लिहाज़ा दोनों अलग अलग पढ़ते हैं.. लड़का एक राजकीय विद्द्यालय में गणित पढता है, और लड़की कॉन्वेंट स्कूल में होम साइंस की स्टुडेंट (राजकीय बोले तो सरकारी..)
दोनों ने अभी अभी बोर्ड के पपेर्स दिए हैं.. लड़के के बारहवीं के और लड़की ने हाई-स्कूल निपटाया है..
दोनों अलग अलग परिवेश में पले बढे.. अलग अलग हालातों में खेले कूदे.. लिहाज़ा प्रेम तो संभव नहीं है..
लड़के ने अपने बोर्ड को टॉप करके एक बड़ी इंजीनियरिंग की परीक्षा उत्तीर्ण की.. पर पैसों की कमी से वो दाखिला नहीं ले पाया.. (इंजीनियरिंग कॉलेज तो आना ही नहीं चाहिए बीच में किसी भी तरह॥)

किसी तरह बी.ऐ. करके एक दिन उसने वो कर दिखाया जो उसके परिवार वालों का सपना था.. उसने सरकारी नौकरी के लिए "समूह ग" की परीक्षा को भी टॉप किया..
और इस तरह बिना किसी को रिश्वत दिए उसकी नौकरी लग गयी...
लड़की से वो मिला भी नहीं था.. पर लड़की के पिताजी उसके अफसर थे.. अब अपने अफसर की बेटी से प्रेम करना संभव तो नहीं था.. (इंजीनियरिंग कॉलेज विहीन करने के बाद शायद ये प्रेम रहित कहानी भी बन जाये..)
एक दिन उसके अफसर ने उसे बुलाया.. और बताया कि आज बेटी को देखने लड़के वाले आ रहे हैं इसीलिए उन्हें थोडा जल्दी घर जाना होगा.. और उन्हें घर पर उसकी मदद की जरूरत भी पड़ेगी..
वो खुशी-खुशी सारा काम छोड़कर उनके घर गया॥ शाम तक वो मेहमाननवाजी में हाथ बंटाता रहा.. उस दिन उसने पहली बार लड़की को देखा था.. (पर उसे प्यार नहीं हुआ..)

दो दिन बाद ऑफिस में बॉस का लटका चेहरा देखकर उसे समझ आ गया कि बात नहीं बनी.. उसने इस बारे में कुछ पूछा भी नहीं. उसे मतलब भी क्या था, वो कौन से लड़की से प्रेम करता था..

खैर... इस घटना को कई महीने बीत गए.. और एक दिन अचानक उसने नौकरी छोड़ दी.. कारण उसका चयन "राज्य प्रसाशनिक सेवा" में हो गया था..
माँ-बाप की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. आज उन्हें अपने बेटे पर असीम गर्व का अनुभव हो रहा था..

जल्दी ही उसकी नियुक्ति बतौर तहसीलदार हो गयी..
समय पूरी तरह बदल चुका था.. कल तक माँ-बाप दो जून की रोटी के इंतजाम में परेशान थे.. आज उसकी शादी के लिए उपयुक्त मिलान ना खोज पाने से परेशान थे..
हालांकि आज उसके लिए शादियों के रिश्तों का ढेर लगा था.. और इसी ढेर में उस लड़की का रिश्ता भी कहीं पढ़ा था..
एक दिन उसने सोचा देखे किस तरह के रिश्ते उसके लिए आये हैं , तभी अचानक उसकी नज़र लड़की के फोटो पर पड़ी
अंततः लड़के और लड़की की शादी हो गयी... (प्रेम मगर अब भी नहीं हैं..)

Comments

दिलीप said…
sahi ha badi hatke likhi aakhir shadi karwa di bina prem...
दर्शन said…
अच्छा प्रयास है :) , मगर सर्वजन को शायद प्रेम की आदत सी हो गयी है तो प्रेम रहित कहानी को बर्दाश्त करना अक्सर मुश्किल हो जाता है ! हाँ ये जरूर कहूंगा कि पाठक बंधे रहते हैं पूरी लेखन से अंत तक ! सच बोलूं तो तुने कुछ नया प्रयोग करके लिखने कि जो कोशिश की है वो सराहनीय है ,शायद परिष्कृत होकर एक बेमिसाल लेखक बनने की नई छलांग है !

गुड :) !!!!!!
Akash said…
dost, Jahan ek ladka-ladki hon prem ko chodna possible nahi hai isliye pyar to hoga hi .. picture kahani ke bad bhi chalegi.. aur sach kahun to kahani char ladkon ki hi achi rehti..kya hum dosti pe nahi likh sakte jo engineering college ki ho aur marte dum tak chale....!!
dear basli
kya hai ki har kahani main kuchh aisa hona chahiye jo pathak ko sochne par majboor kare
kahani likhna apni baat ko kahne ka ek tareeka hai
to is nazariye se mujhe vastav main kuchh khaas nazar nahi aayaa
tum jo kahne chahte ho wo likho
tum jo sochte ho wo likho
don't stop yourself!

MERI NAZAR MAIN KAHANI KA MAJAA WAHAN SHURU HOTA HAI, JAHAN TUMNE KAHANI KHATAM KAR DI
KAHANI ABHI BAAKI HAI MERE DOST
finish it!
Neeraj said…
अगर भगवान् ने किसी को ताक़तवर बनाया है तो साथ ही उसे कमजोरों की रक्षा करने का दायित्व भी सौंपा है, ये अलग बात है कि वो सिर्फ शरीर का सुगठन एवं प्रदर्शन करने में ही स्वयं को व्यस्त रखता है | उसे क्या लेना किसी भगवान् से, और उसे क्या पड़ी है किसी कमजोर की रक्षा करने की | उसे तो शरीर सौष्ठव में ही मजा आता है, वो तो वही करेगा | लेखन की क्षमता माँ सरस्वती का अद्भुत वरदान है , और ये तुम्हें मिला है |

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