एक किस्सा (४) : दिल चाहता है..
"सुबोध... तुम्हे टाइम याद नहीं है ? "
"ऑफ कोर्स याद है , ठीक पाँच बजकर पचपन मिनट हुए थे.."
कुछ याद आया ? ये "दिल चाहता है" नाम की एक फिल्म में दोहराया गया संवाद है..
सुबोध नाम के किसी शख्स की मेरे जीवन में एंट्री से बहुत पहले सुबोध नाम की मेरी दिमाग में एक छवि बन चुकी थी.. सधन्यवाद फरहान अख्तर कृत "दिल चाहता है" के किरदार सुबोध की वजह से... अब जिन लोगों ने ये फिल्म नहीं देखी हो उनकी जानकारी के लिए बता दूँ कि सुबोध "दिल चाहता है" का वो किरदार है , जिसे Tag Heuer, Omega, या Rolex के सस्ते विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है... इनकी इसी खूबी की वजह से इनका नाम "टाइम टेबल" भी है...ये साधारण जीवन की असाधारण तरीके से ऐसी तैसी करने में लगे रहते हैं .. सुबह पाँच बजे उठके योगा, मोर्निंग वाक्, वगैरह वगैरह.. यहाँ तक कि रविवार को भी उनकी दिनचर्या तय है...
खैर जब मुझे रीवा के तथाकथित boyfriend का नाम पता चला, तो दिल को एक सुकून सा मिला. सुबोध... :)
ना तो रीवा पूजा थी ना मैं समीर... पर जाने क्यों दिल कहता था कि सुबोध सुबोध ही होगा...
अब मेरे होश ट्रेन में फाख्ता हो चुके हैं ये खबर हॉस्टल में आग की तरह फ़ैल चुकी थी... कई शुभचिंतक अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत कर चुके थे.. रीवा उपाध्याय के बजाय वो "करण वाली" नाम से जानी जाने लगी.. "करण वाली" के अस्तित्व में आने के बाद कुछ लोग करण के साथ सीधे सीधे मुकाबले में आ चुके थे.. हॉस्टल कुछ खेमों में तब्दील हो गया , तलवारें खिंच चुकी थी.. पर अफ़सोस किसी को ये भी नही पता था कि जिसके लिए ये जंग-ऐ-मैदान बिछाया जा रहा है.. वो युध्द से बहुत पहले ही सुबोध को विजेता घोषित कर चुकी थी... उसका एक boyfriend भी है...
"मेरा कोई boyfriend नहीं है.. for your kind information... " कॉफी के प्याले में हलके हलके चम्मच घुमाते हुए घुमती कॉफी को देखती हुयी अंजलि बोली..
"तुमसे किसी ने पूछा कि तुम्हारा कोई boyfriend है या नहीं ?" मेरी आवाज़ थोडी तेज थी शायद , दो-चार लोंगो ने पलट के देखा मुझे..
"नहीं मैंने सोचा... तुम्हे बता दूँ.. ताकि आज तो कॉफी के लिए मैंने invite कर लिया पर आगे से तुम पूछना चाहो तो शरमाओ नहीं.." उस मुस्कराहट में कुछ तो था..
"तुम चाहती क्या हो यार.." मेरी आवाज में थोडी झुन्झुलाहट थी इस बार पर स्वर धीमा था..इस बार किसी ने मुड़ के हमारी तरफ नहीं देखा...
"बड़े अजीब आदमी हो यार.. इतने दिन से हिंट देने की कोशिश कर रही हूँ.. समझते ही नहीं हो..."
"देखो अंजलि.. मैं तुम्हारे बारे में ऐसा कुछ नहीं सोचता..तुम..."
"ओह्ह हेल्लो...!!!!!!!!!!!!!! तुमसे किसने कुछ ऐसा सोचने को बोल दिया.. तुम लड़कों की यही दिक्कत है.. लड़की ने चल के बात कर ली तो कुछ भी सोचने लगे..."
"अरे नहीं ..मेरा वो मतलब नहीं..."
"हाँ तो क्या हुआ मैंने दोस्ती के लिए पहल की...."
"अरे... मेरी बात तो समझो.." उसका अचानक गुस्सा और मेरा अचानक मिमियाना...
"हाँ तो क्या हुआ...तुम्हारी गर्लफ्रेंड नहीं है तो मैंने भी बता दिया कि मेरा boyfriend नहीं है.." अब लोग पलट के नहीं देख रहे थे...बल्कि कुर्सी घुमा के हमारी तरफ मुँह करके ही बैठ गए...
"अच्छा बाबा..मेरी बात तो सुनो.." मैंने चारों तरफ एक सरसरी नजर फेरी...
"तुमसे खुद चलके बात करती हूँ.. मतलब कुछ भी सोचोगे क्या..."
"अच्छा बाबा.. माफ़ कर दो.."
"हाँ , ये बात हुयी ना.. खैर ऐसा वैसा सोच भी लिया तो कोई बात नहीं... अब ये बताऊ क्यूँ मेरे बारे में ऐसे नहीं सोचते तुम.. बुराई क्या है मुझमे.. जवान हूँ.. खुबसूरत हूँ... पढ़ी लिखी हूँ...बोलो..?" और ये कहके उस चहरे पे वही मुस्कराहट वापस आ गयी...
काफी देर तक सामने बैठ के उसे कॉफी की चुश्कियाँ लेते देखता रहा.. कॉलेज कैंटीन में हर आता जाता हमारी तरफ बड़े गौर से देख कर गुजरता जा रहा था...
"हाँ सर.. अब तो बता दीजिये कि मुझे बुलाया क्यूँ है..."
"कुछ नहीं.. सोचा ऐसे ही ..तुमसे वो ट्रेन वाली बात के लिए माफ़ी माँग लूँ .."
"सर .. कैसी बात कर रहे हैं.. माफ़ी तो मुझे मंगनी चाहिए..वो अपनी बदतमीजी के लिए.."
"नहीं नहीं..."
"अरे आपकी कॉफी ठंडी हो रही है... पीजिये ना.."
"अरे हाँ.. जल्दी ख़त्म कर देता हूँ वर्ना कोल्ड कॉफी के पैसे देने पड़ जायेंगे फालतू में.." मुझे पता था कि बहुत ही घटिया मजाक किया मैंने पर कुछ तो बोलना ही था.. बेचारी रीवा की समझ में तो आया नहीं...पर "हेहेहेहेहेहे" करके वो एक-दो सेकंड के लिए हलके से मुस्कराकर मेरी हालत पर सांत्वना दे गयी...
"और कैसा है तुम्हारा boyfriend ?"
"सुबोध....??? वो अच्छे हैं..."
"......." मेरी आँखों में "दिल चाहता है" के एकाध दृश्य तेजी से उबरने लगे...
"हमने साथ में कोचिंग की है... आपने गुरु नानक देव इंजीनियरिंग कॉलेज का नाम तो सुना ही होगा..??"
"हाँ " मैंने "गुरु नानक देव" और "इंजीनियरिंग कॉलेज " अलग अलग तो सुने ही थे ..सो हाँ बोल दिया..
"वहीँ पर है..."
"अच्छा..."
"सर..मुझे इंजीनियरिंग ग्राफिक्स की कुछ शीट बनाके देनी है कल..तो मैं चलती हूँ...
मन किया पूछूं की "मैं बनाने में मदद कर दूँ" .. और अपने तमाम मित्रो की तरह मैं भी रात को किसी लड़की के लिए ग्राफिक्स शीट बनाते हुए इस अनन्य साधना में अपना योगदान प्रदान करूँ.. वैसे भी मेरे कई मित्र रात रात को तमाम तरह की देवियों को प्रसन्न करने के लिए सेमेस्टर से पहले इस तरह की कई साधनाओं में लिप्त रहते थे..
पर मैं जानता था कि ये तो "shut and close case" है ..लिहाज़ा मदद के लिए खुद को प्रस्थान करना बेकार ही है..
वो चली गयी और मैं तमाम रेखाओं , कोणों, वृतों और त्रिभुजों के बीच में खुद को खोया सा महसूस करने लगा...
किसी ने पीठ पर जोर से मुक्का मारा तो मैं होश में वापस आया... तीन चार कमीने किस्म कि शक्लें अपने आसपास नज़र आई.. शायद दोस्त इन्हें ही कहते हैं.. जो गिद्ध की तरह आपके आसपास मंडराते रहें जब आप किसी खुबसूरत लड़की के साथ बैठे हों.. और जो उस लड़की के जाते ही बाज कि तरह झप्पटा मारके आपको घेर लें..
"अबे साले..तेरी तो निकल पड़ी ..बता ना क्या बात हो रही थी..."
"बड़ा क्यूट कपल है बाय गौड... चल डिटेल में बता जल्दी जल्दी..."
"अरे कुछ नहीं यार... क्या बात होनी थी.."
"बता ना साले ..क्यूँ भाव खा रहा है.. ??"
"अरे सच में यार... जब बात हुयी ही नहीं तो क्या बताऊँ.."
"हाँ हमें क्यूँ बताएगा.. बेटा लड़की आने के बाद सब बदल जाते हैं..."
"अरे सच में..तुमसे क्यूँ छुपाउंगा ..."
"हम्म्म ..चल कोई नहीं... बोल कॉफी पिएगा या चाय..."
"चाय.. इलायची वाली.."
"वाह बेटा ..आ गया औकात में.. साले लड़की के साथ कॉफी.."
"अरे नहीं कॉफी उसने ली थी.. मैंने तो चाय ही ली थी.."
"बेटा तेरे पीछे ही खड़े थे हम जब तू आर्डर कर रहा था..."
क्या बोलता उससे आगे...
"हेल्लो.. कहाँ खो गए... कुछ पूछ रही हूँ तुमसे.." अंजलि ने एक चुटकी मारी मेरी आँखों के आगे..
"कुछ नहीं ऐसे ही.."
"खैर छोड़ो..ज्यादा मत सोचो.. चलो मुझे घर ड्राप कर दो.."
"यार मेरे लिए उल्टा पड़ेगा.. तुम बस नहीं लोगी क्या ??"
"अजीब आदमी हो यार... अब क्या मैं बीस मिनट ऑफिस बस के लिए कड़ी रहूंगी.. नहीं छोड़ना तो बोल दो बहाने मत बनाओ"
"अच्छा ठीक है.. चलो... "
"हाँ , ये हुयी ना.. तुम भी सच में अड़ियल आदमी हो यार.."
"चलो अब .लेक्चर मत दो ...."
"क्या बोलता है.. कैसी लड़की है अंजलि.." मैंने राकेश से पूछा.. वैसे ये कुछ कुछ ऐसा ही था..जैसे नदी में एक कंकन इस उम्मीद से फेंकना कि ये पानी की सतह से टकरा कर वापस आ जायेगा..
"कैसी मतलब.."
"अच्छी या बुरी..और कैसी.."
"लड़की ही होगी या अच्छी ही होगी.." ये चोट खाया हुआ आशिक बोला था शायद..
कुछ देर कमरे में सन्नाटा छाया रहा.
"माफ़ कर दे रजनी को यार.. वो इतनी भी बुरी नहीं थी.. जितनी तू सोचता है..." मुझे लगता नहीं कि राकेश रजनी के बारे में सोच रहा था.. पर मैं सोच रहा था..
वो अब भी खामोशी से पड़ रहा था..
"तुझसे बोल रहा हूँ.." मैंने उसे एक बार फिर झकझोरा...
"तू ही तो रोज कहता था..कि वो तुझे यूज कर रही है राकेश.. तब मैं तेरी बात नहीं सुनता था... आज तू कह रहा है.."
"हाँ लेकिन..." मैंने एक सांस ली.. "जाने दे यार...अच्छा रहने दे ये बात.." ये बता गौरव अब तक क्यूँ नहीं आया..?"
"मुझे क्या पता.. अंजलि का फ़ोन आया था शायद... उनके कॉलेज का कोई फ्रेंड पुणे आया है.."
"कब"
"जब तू आया उससे थोडी देर पहले..."
"अरे मैं तभी तो अंजलि को घर छोड़ के आया था..."
"अच्छा..तभी पूछ रहा है कि अंजलि कैसी लड़की है.."
"अरे नहीं यार... ऐसे ही कभी कभी रीवा के जैसी लगती है वो ..."
"ह्म्म्म... ये तो पता नहीं कि कैसी लड़की है...पर तुझे पसंद करने लगी है शायद..."
"मुझे भी लगता है..." मैंने सोचा नहीं था कि राकेश इन सब बातो पर इतना ध्यान देता होगा..
"चल दिमाग मत लगा ज्यादा... सो जा अभी.." राकेश ने कमरे कि लाइट बुझा दी...
वो सो गया..पर मैं दिमाग को कैसे सुलाता... और ये रह रह के अंजलि पे ही क्यूँ जा रहा है आज घूम घूम के.. अंजलि अंजलि सोचते सोचते जाने कब मैं सो गया...
अगले दिन अंजलि ऑफिस नहीं आई.. हमें अभी तक कोई प्रोजेक्ट नहीं मिला था.. दिन तो थोड़े लम्बे थे ही उन दिनों..बिना प्रोजेक्ट के थोड़े और लम्बे हो जाते थे..और आज तो बिना अंजलि के रात के बदले का टाइम भी जैसे खुद में समेट लिया हो इस दिन ने...
"हेल्लो.."
"हाँ अंजलि.. मैं बोल रहा हूँ.. करण .. कहाँ हो तुम.."
"घर पे ही हूँ.." आवाज से एक अन्जलिपन गायब सा था..
"क्या हुआ??"
"कुछ नहीं.."
"मैं आ रहा हूँ तुमसे मिलने.."
"नहीं करण.. मेरा अभी मन नहीं है.."
"अरे.. ऐसा कैसे मन नहीं है.. सात बजे मिलो मुझे..मिर्च मसाला में.. साथ में डिनर करेंगे.." कहके मैंने फ़ोन रख दिया..पर अजीब लगा जिस अधिकार के साथ उसे आदेश दिया था मैंने..
"क्या हुआ.." खाना आर्डर करने के बाद बुझी सी खुबसूरत लड़की से पूछा
"कुछ नहीं.."
"दोस्त बोला था ना तुमने. तो बताओगी नहीं..." मैंने माहौल को थोडा भावनात्मक रंग देने कि कोशिश की..
भावनाओ को भड़काने की मेरी कोशिश कभी सफल नहीं हुयी..पर उस दिन मेरा पासा पहली बार सटीक जगह पड़ा...
"मैंने उसे प्रपोस कर दिया.."कहके वो सुबकने लगी..
"किसे.. गौरव को.."
"हाँ..."
"तो इसमें रोने वाली बात क्या है..?"
(जारी )
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