मुझे चाँद चाहिये : Platonic love
बहुचर्चित वेबसाईट "विकीपीडिया" पर प्लेटोनिक प्रेम की परिभाषा कुछ इस तरह से दी गयी है;
Platonic love in its modern popular sense is a non-sexual affectionate relationship, especially in cases where one might easily assume otherwise. A simple example of platonic relationships is a deep, non-sexual (i.e. overtly romantic) friendship, not subject to gender pairings and not excluding close relatives.
प्लेटोनिक प्रेम ......... ये शब्द हमेशा दिल में कहीं कौंधता रहा है मेरे। और अक्सर मैंने कोशिश की है, कि आखिर मैं समझ सकूँ प्रेम के उस अनुपम रूप को जिसकी व्याख्या कर पाना हर लेखक के लिये हमेशा असम्भव सा रहा है।
जगजीत सिहं की गज़ल "शायद मैं ज़िन्दगी कि सहर" की चार पंक्तियाँ शायद प्लेटोनिक प्रेम की सही ढंग से व्याख्या कर पायी हैं ।
"ताउम्र ढूंढता रहा मंजिल मैं इश्क़ की ,
अन्जाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया। "
इसी कड़ी में कुछ वर्ष पहले सुरेन्द्र वर्मा जी का उपन्यास "मुझे चाँद चाहिये" पढ़ा था । और उस एक उपन्यास ने मुझे विश्वास करने पे मज़बूर कर दिया कि कुछ भी ऐसा इस सृष्टि में मौजूद नहीं जिसे लेखनी से शब्दों में ना ढाला जा सके ।
लखनऊ जिले में एक छोटा सा शहर है शहाजहाँपुर ...। इस छोटे से शहर में एक लड़की के साथ कई सपने एक साथ जन्म लेते हैं । हर कदम पर अपने ऊपर थोपे गये दायरों की नीचा दिखाती ये लड़की हर उस सपने को मयस्सर कर दिखाती है, जिसके बारे में सोच पाना भी किसी आम इन्सान के दायरों से बहुत बाहर की बात होती है । इस उपन्यास में कई सवाल एक साथ हैं । और सच कहूँ तो खुशी होती है इतने सारे रूढ़िवादी सवालों को एक साथ विवश होकर टूटते हुये देखने से ।
शहाजहाँपुर की मुमताज से शुरू हुआ वर्षा वशिष्ठ का सफ़र उसे फ़िल्मिस्तान के गलियारों की मल्लिका बना देता है। उसके इस सफ़र में प्यार भी उसकी राहों में आता है, समाज भी, परिवार भी, हार भी, और तनाव भी ।
मरती हुयी माँ का चेहरा ना देख पाने के गम भी हैं, ज़िन्दगी की दौड़ में हार चुके हर्ष की प्रेरणा बन पाने का साहस भी है, अपने वज़ूद की हक़ीकत का अन्दाजा भी है , और तमाम दुनिया में भिन्न भिन्न सफ़लता के आयामों को लेकर चलने वाले हर इन्सान की मज़बूरी देख सकने की विवशता भी है ।
वर्षा की ज़िन्दगी शायद हर मुकाम को छूती हुयी लगती हो , पर प्रेम से रीता उसका जीवन मेरी इस धारणा को प्रबल कर देता है, कि प्रेम सफ़लता की राहों में शायद सिर्फ़ एक अल्पविराम का ही काम कर सकता है , उससे ज्यादा कुछ नहीं शायद यही प्रेम की विडम्बना है कि हर कोई सफ़लता पाना चाहता है और शायद प्रेम और सफ़लता एक दूसरे के पूरक कभी नहीं हो सकते ।
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