सफ़र की मज़बूरी... या सिर्फ़ मज़बूरी का सफ़र???

न्यूयॉर्क में सर्दियाँ शुरू हो गयी हैं। तेज भागती यहाँ की ज़िन्दगी में आने वाले समय की परछाई साफ़ नज़र आने लगी है. आने वाले समय का ठहराव दिखने लगा है. काफ़ी समय बाद आज सोच रहा हूँ कि यहाँ के अपने अब तक के अनुभवों को लिखा जाये.
आज से कोई ६ या ७ हफ़्तों पहले जब नेवार्क एअरपोर्ट पर उतरा था, तो एक धुकधुकी सी थी मन के किसी कोने में, मुझे रत्ती भर भी अन्दाजा नहीं था कि ज़िन्दगी कितनी अलग हो सकती है यहाँ पर, एअरपोर्ट पर उतरा तो एक अफ़्रिकन टैक्सीवाले ने मुझसे पूछा -"यू नीड ए टैक्सी ?". मैनें उसे अपने गन्तव्य के विषय में बताया तो उसने कहा "फ़ोर्टी फ़ाइव डॉलर.." इससे पहले मैं उससे कुछ कह पाता कि एक आवाज ने मेरा ध्यान अपनी और खींचा " जर्सी सिटी जाना है क्या? "
बात हिन्दी में पूछी गयी थी, तो बताने की जरूरत नहीं कि मैंने कौन सी टैक्सी ली होगी । मुझे आश्चर्य हो रहा था कि मैंने ऐसा क्यों किया ?, सिर्फ़ १८ घन्टे के सफ़र ने मुझे भाषावादी और क्षेत्रवादी बना दिया. न्यूयॉर्क की धरती पर मेरा लिया हुआ पहला निर्णय था ये वो भी भाषावादिता की परिधि में।

खैर, एक बात है...भारत और यहाँ की ज़िन्दगी में काफ़ी फ़र्क है, और उस बड़े फ़र्क के बीच की दूरी का मतलब भारतीय साफ़्टवेयर इंडस्ट्री है, ये वो लोग हैं जो ना जाने कब से इस खाई को पाटने का काम एक जिम्मेदारी की तरह कर रहे हैं , कभी पैसों के लिये कभी कर्तव्यों के लिये. और चाहे जितने भी नाम दे दिये जाये या चाहे जिस दृष्टिकोण से भी देख लिया जाये, कहीं ना कहीं एक सम्पूर्णता की कमी साफ़ झलकती है। जाने ये मज़बूरी है या फ़िर सिर्फ़ एक छलावा पर कहीं ना कहीं मेरे दिमाग में एक सवाल आ ही जाता है, अगर रुपये और डॉलर की कीमत बराबर होती तो?????

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