मेरी दैनन्दिनी 4

१० मार्च २००५

उस पर पहला पॄष्ठ.. नाम रोशनी शर्मा .. कौन है? क्या है? कहाँ है? कैसी है? नहीं जानता.. अगर जानता हूँ तो बस इतना कि कोई तो थी कभी.. जिसे आज तक मैं भूला नहीं हूँ.. कोई ऐसी जो शायद इस वक़्त मेरे अन्तर्द्वन्दों की एक वजह समाप्त कर सकती है.. मैं जानत्ता हूँ जो इस वक़्त मैं सोच रहा हूँ वो ना तो आदर्शों के दायरे में आता है और ना ही कृत्यों के दायरे में.. पर मेरे सामने सिर्फ़ एक यही रास्ता है पारूल की छाया से बाहर आने का..
खैर सच कहूँ तो एक वक़्त पर वो मुझे पसन्द थी .. कभी ये यकीन नहीं था कि कभी उसकी भेजी हुयी मेल पढ़ूँगा..
और आज हसरत ये है कि दिल के किसी कोने में एक खयाल पनपने लगा है, कि क्या हो अगर वो जीवन में वापस आ जाये.. कौन जाने भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है पर फ़िर भी जिस उलझन से मैं पिछले तीन सालों से निकलना चाह रहा हूँ शायद रोशनी इसवक़्त इकमात्र रास्ता है...

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