मेरी दैनंदिनी - ५
०५ अप्रैल २००५.....
ख़ुशी ने आख़िर थोड़ा बहुत अपना मकाम बना ही लिया है मेरे जीवन में । सोचा नहीं था मगर आज मेरे आस पास कोई एक ऐसा है जिसकी नजर में मैंनें कोई गलती नहीं की ।
अब जबकि पारुल से एक बार बात हो चुकी है। चाहे हिसाब सही से लिए दिए ना गये हों , फिर भी इतना तो है कि मेरे अस्तित्व पे एक समय सवाल खड़ी करने वाली ने आज मेरी एक छोटी सी बात मान ली। कॉलेज लगभग ख़त्म हो चुका है , जूनियर्स ने फेयरवेल (विदाई समारोह) की तैयारीयाँ शुरू कर दी हैं. और इस समय मैं अपने आपको बंधनमुक्त महसूस कर रहा हूँ। स्वतंत्र .........
वास्तव में सच एक बहुत बड़ी चीज होती है पर उस सच से भी बड़ा होता है उसे भुना सकने का विश्वास । और शायद यही एक विश्वास होता है जो उस सच पे आपको यकीन करने को मजबूर कर देता है और शायद इंसान के हर बड़े दर्द की एक दवा बन जाता है ये विश्वास ॥
असल में बातें बहुत खुश होने वाली नहीं भी हों पर हम उन्हें बार बार सोच के अपनी खुशियों को बढाते रहना चाहते हैं और यही मैं इस वक़्त कर रहा हूँ । आठ दिन पहले पारुल से बात हुयी थी, और मैं ही जानता हूँ कि पिछले आठ दिनों में मेरे अन्दर किस भावना ने जन्म लिया है .... ये अहसास, ये सुकून , ख्वाहिसों का ये मंजर कहाँ था ये पिछले तीन साल से.........
मुझे लगता था कि हम किसी तरह जी ही लेंगे और एक दिन ऐसा भी पायेंगे... लेकिन मुझे सच मी नहीं पता था कि मुझे हमेशा सही लगता था...
(वक़्त के थपेडों में प्यार के नाम पर खो चुकी एक दोस्ती को समर्पित )
ख़ुशी ने आख़िर थोड़ा बहुत अपना मकाम बना ही लिया है मेरे जीवन में । सोचा नहीं था मगर आज मेरे आस पास कोई एक ऐसा है जिसकी नजर में मैंनें कोई गलती नहीं की ।
अब जबकि पारुल से एक बार बात हो चुकी है। चाहे हिसाब सही से लिए दिए ना गये हों , फिर भी इतना तो है कि मेरे अस्तित्व पे एक समय सवाल खड़ी करने वाली ने आज मेरी एक छोटी सी बात मान ली। कॉलेज लगभग ख़त्म हो चुका है , जूनियर्स ने फेयरवेल (विदाई समारोह) की तैयारीयाँ शुरू कर दी हैं. और इस समय मैं अपने आपको बंधनमुक्त महसूस कर रहा हूँ। स्वतंत्र .........
वास्तव में सच एक बहुत बड़ी चीज होती है पर उस सच से भी बड़ा होता है उसे भुना सकने का विश्वास । और शायद यही एक विश्वास होता है जो उस सच पे आपको यकीन करने को मजबूर कर देता है और शायद इंसान के हर बड़े दर्द की एक दवा बन जाता है ये विश्वास ॥
असल में बातें बहुत खुश होने वाली नहीं भी हों पर हम उन्हें बार बार सोच के अपनी खुशियों को बढाते रहना चाहते हैं और यही मैं इस वक़्त कर रहा हूँ । आठ दिन पहले पारुल से बात हुयी थी, और मैं ही जानता हूँ कि पिछले आठ दिनों में मेरे अन्दर किस भावना ने जन्म लिया है .... ये अहसास, ये सुकून , ख्वाहिसों का ये मंजर कहाँ था ये पिछले तीन साल से.........
मुझे लगता था कि हम किसी तरह जी ही लेंगे और एक दिन ऐसा भी पायेंगे... लेकिन मुझे सच मी नहीं पता था कि मुझे हमेशा सही लगता था...
(वक़्त के थपेडों में प्यार के नाम पर खो चुकी एक दोस्ती को समर्पित )
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