मेरी दैनंदिनी - ९
२२ मई २००५
लिखना सिर्फ़ एक कमजोरी है , दुनिया से थककर , अपने से भागकर सिर्फ़ अपने को छूने भर की एक कोशिश है लिखना । और ये कोशिश वही लोग करते हैं जो ख़ुद को देख नहीं पा रहे होते।
समय कितना बदल जाता है , दो साल पहले अगर परीक्षा से तीन दिन पहले तक मेरे हर विषय की २-३ यूनिट ना पूरी हुयी होती तो मैं शायद बहुत ही ज्यादा परेशान होता इस वक़्त । मगर आज पढाई शुरू भी नही की है फ़िर भी एक अजीब सी संतुष्टी है मन में । ये अनुभव नहीं है , इसे वक्त बदलना कहते हैं, आज परीक्षाओं की जरूरत ही नहीं है , आज परिणाम का भी इंतज़ार नहीं, आज तो परीक्षार्थी भी मैं ही और परीक्षक भी मैं स्वयम । खैर इस वक्त मुझे उन दो पृष्ठों की प्रतीक्षा है जो मेरे इस महाविद्यालय जीवन के प्रथम अहसास यानी मानसी ने मेरे लिए लिखें होंगे ।
अजीब बात है ना .. , मानसी से रिश्ता कभी रहा ही नही , पारुल से कभी बना ही नही , और रोशनी के साथ बनने की उम्मीद भी नहीं । फ़िर भी कैसी कैसी अजीब सी बातों का इंतजार है मुझे, और मेरा यही इंतजार मुझे आँखें बंद करके अपने अन्तर से एक सवाल करने पे मजबूर करता है ।
" क्या मेरे लिए मुक्ती सम्भव है ?? "
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