मेरी दैनंदिनी - ११


२६ मई २००५


जैसे ईश्वर अपनी सम्पूर्ण भक्ति को कहीं छुपाकर कहीं भाग जाना चाहता हो , आज पारुल का पलटकर मुझे देखना मेरे अन्दर कहीं कहीं वैसे ही भाव जगा गया । जाने क्यों स्वयम् की विवशता को दूसरे की आंखों में झाँककर देखने की इच्छा दिन पर दिन मुझे खींचती जा रही है ।

आज सिंहावलोकन का दौर है , हर दिन हर पल ये सोचने में बिताया जा रहा है कि पिछले चार साल में आख़िर किया क्या है?? आज वास्तव में सोचना चाहिऐ कि पिछले चार में किया क्या है ? हम यहाँ पर एक चार साल की डिग्री की खातिर आये थे परन्तु ये भी सच है कि हम यहाँ पर विशुद्ध सिर्फ एक डिग्री लेने की खातिर नहीं आये थे। यहाँ आने से पहले हमारे माता पिता ने हमारे जीवन - समर की बागडोर हमारे हाथों में देने से पहले एक बार जरूर सोचा होगा कि ना जाने क्या होगा ? हमारे बेटे या बेटियाँ क्या इस जीवन समर में जीत पाएंगे।

आज से चार साल पहले हम सभी अपने जीवन की लड़ाई में उतर कर युद्ध का विगुल बजा चुकें हैं। आने वाला वक़्त तय करेगा कि हम यहाँ जीवित बचकर धरती के सुखों में रहेंगे या फिर वीरगति हमारा इंतजार कर रही है?
इंजीनियरिंग कि पिछले चार वर्ष कर्मभूमि में बिताये शुरूआती सुहावने पल तो नहीं थे, पर हाँ ये चार वर्ष एक धर्मयुद्ध कि भेंट जरूर चढ़ गए और आज इस धर्मयुद्ध में मैं कम से कम खुद को तो विजय मान ही सकता हूँ । चाहे ये " स्वयमेव मृगेन्द्रता " हो या न हो ॥

पिछले चार साल , दर्शन का "ये कश्मीर है" जैसा एक छोटा सा ख्वाब , अंकित का वादा , मानवेन्द्र की उम्मीदें , राजन का भरोसा , रजत की मुस्कान, मेधा का साथ , हैरी के साथ नोक-झोंक, मानसी का शुक्रिया कहना, पारूल का विजय भ्रम , मंजू की हौंसला अफ़जाही , बबिता की टीस, नेहा के मजाक , तिवारी के उद्गार, अलोक की कसक , अंकुर की आख़िरी सहृदयता , मुक्तेश की भावनाएं , दिव्य का पुराना सुख , प्रियंक की स्वीकारोक्ति और भी ना जाने क्या क्या ? और क्या चाहिऐ था आख़िर ? इतना सब तो मिल गया ॥

और आज उसका पलटना , तीसरी बार सिर्फ एक मिनट के अन्दर बस मेरे लिए यही काफी है इतना कहने को ,

"स्वयमेव मृगेन्द्रता "

Comments

Poonam Nigam said…
So, its your diary from college days.Seems you live those moments each time while reading and writing.
पंकज said…
very true... actually lifes these things are the big part of who you are.. so I think i have that enough respect for my deeds and happeningins. this always helps me to think better..:)
thanks again

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