मेरी दैनंदिनी - १०

२४ मई २००५

अपने गम को गीत बनाकर गा लेना

राग पुराना तेरा भी है मेरा भी

एक खास दिन का इंतज़ार था मुझे , पर वो कभी मेरी जिंदगी में आया ही नहीं । आया है तो ये दिन जो तब भी आ सकता था अगर मैंने अपने शुभचिंतकों की बात मान ली होती , चाहे वो अंकित का पारूल को भूल जाने को कहना होता , चाहे दर्शन का इस अजीब से अहसास को चुनौती देना ।

कॉलेज में डायरी लिखवाने का वक़्त चल रहा है , प्रतिआक्रमण के इस दौर में प्रियंक की लिखी बातें भी पढ़ चुका हूँ । दर्शन और अंकित त्यागी क्या लिखेंगे मुझे पता है , आलोक , चौहान और आशीष से मुझे कुछ आश्चर्यजनक और अलग सा अच्छा या बुरा सुनने या पढ़ने को मिलेगा , ये उम्मीद भी नहीं । मानवेन्द्र , राजन और रजत बचे हैं , वो क्या कहेंगे देखते हैं।

आज आने वाला दिन खास भी हो सकता है और आम भी । इस वक़्त सुबह के ५ बज रहे हैं , मैं लिख रहा हूँ । दुनिया की किसी बात का कोई ओर -छोर इस वक़्त मेरे पास नहीं है , क्यों लिख रहा हूँ ये तो नही मालूम पर लगता है लिखना था ये मालूम था मुझे।

कल से आखिरी सेमेस्टर के पेपर शुरू हो रहे हैं , यानी ये कॉलेज छोड़ने की उलटी गिनती शुरू हो जायेगी कल से । यहाँ रुकने का मन तो कभी था नहीं और कोई रोक भी नही रहा है पर आज अफ़सोस हो रहा है उन सब रिश्तों के लिए जिनसे मैं दामन बचा के निकल जाना चाहता हूँ । अफ़सोस हो रहा है मुझे , क्या हो गया है मुझे ? क्या मैं खुद में ही पागलपन की विमायें छूने जा रहा हूँ ???

खैर जो भी हो कल के लिए खुद के लिए दुआएं कर रहा हूँ इस वक़्त

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