मेरी दैनंदिनी - अन्तिम भाग
१६ मार्च २००८ क्या आप ये मानते हैं कि दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं जो आप नहीं कर सकते ? अगर नहीं तो फ़िर ये आपके पढ़ने के लिए नहीं लिखा जा रहा है॥ कभी कभी सदियों के सफर को एक पल में समेट लेना इतना भी मुश्किल नहीं होता है जितना कई बार हमें लगता है.. आज से तीन साल पहले जिंदगी पारुल और रोशनी के तराजू में झूल रही थी, फैसला तो मैं आज भी नही कर सकता कि उस वक्त मैं क्या चाह रहा था और मेरी सोच कितनी सही थी.... पर इन तीन वर्षों में मैंने एक चीज जानी है.. इन्सान की जिन्दगी ४ आवरणों से ढकी होती है ॥ पहली सतह उसका ख़ुद का सच होती है , उसकी मान्यताएं, उसके विश्वास , उसकी श्रद्धा , उसका समर्पण और उसका इंतजार ... ये सब मिला के उसकी पहली सतह का निर्माण करते हैं॥ जिसे कभी कभी हम लोग स्वार्थ की नजर से , कभी अहम् की नजर से देखते हैं... उसका दूसरा आवरण बनाती है उसका प्यार.. उस एक इन्सान का वजूद जो उसके अस्तित्व के कण कण में व्याप्त होता है ॥ तीसरा आवरण दोस्त , चाहत , खुशियों की इच्छा और हर उस चीज से बनता है जिसे इंसान अपना कहता है.. नाते रिश्ते, जन्म मृत्यु के बन्धन ,सुख चैन सब यहीं आकर निर्धारित होते हैं......

Comments
wr hv u been?
"past sometime gives us complete story " :)
yea..very true.i liked this thought.
"everyone has two choices only...
either look back with pride or look forward with a hope"
Pankaj,cant we opt these two together..Cant we keep this pride and hope together in our eyes while we move forward in life.I think that'll b d best choice.
Hope to read something about ur present soon.
phir aaj tanhaai me mujko chu gaya koi."
U have written real gud lines dear
I dont know about ur past (jaisa ki kisi ne likha hai) but it will b better ki aap us aag ko bujh jaane do.
Haan, us roshni ko nahi shirf aag ko