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एक किस्सा ....

शाम के तीन बजे उसका फ़ोन आया.. पूछा उसने "क्या कर रहे हो ?" .. मैंने कहा कि कुछ नहीं... ऐसा कहते हुए मैंने एक बार को सोचा कि अगर उसने सुबह नौ बजे भी फ़ोन किया होता तो भी मैं उसको यही जवाब देता और अगर शाम को सात या फिर आठ बजे भी फ़ोन किया होता तो भी मैं यही जवाब देता.. मेरा शनिवार और इतवार तो इंशाल्लाह ऐसे ही कटता था रोज "कुछ नहीं" करते हुए... फिर अचानक ध्यान आया कि इस सोमवार को मैंने मन ही मन कितनी कसमे खायी थी कि इस वीकएंड पे ये करूँगा वो करूँगा... फिर दिमाग को थोडा आराम दिया और सोचा वो तो मैं हर सोमवार को सोचता हूँ.. ये कमबख्त सोमवार भी ना.. इसकी किस्मत भी अजीब होती है... होता सारे दिनों जैसा है पर सबसे ज्यादा गालियाँ खाता है.. चाहे ये किसी भी रूप में आ जाये , गालियाँ पक्के से खानी ही होती है.. खैर.. हम में से भी तो कुछ लोग सोमवार होते हैं ना.. ह्म्म्म्म्म्म्म.... दिमाग के ये सारे घोड़े मैंने एक सेकंड से भी कम टाइम में दौड़ा लिए थे.. लिहाजा अगला सेकंड मेरा दिमाग वापस उसके फोनकाल पर आ गया.. उसने अगला सवाल दागा.. "कुछ नहीं मतलब ?" . अपनी सोचने की मेहनत...

त्यागी , दर्शन और दोस्ती

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आज शाम को ऑफिस से निकलने से पहले रेस्टरूम के शीशे में जब खुद को देखा तो एक पल को रुक सा गया था.. ब्लेज़र पहने अपने आपको एक प्रोफेशनल बन्दे की तरह देखना एक अलग अनुभव होता है शायद.. पहले कभी गौर नहीं किया था... यूँ ही अचानक कॉलेज का फर्स्ट इयर याद आ गया... याद आया कि टाई बांधनी नहीं आती थी .. लॉबी में हम कुछ लोग थे जिनकी टाई त्यागी बांध दिया करता था.. आज खुद को शीशे में देखकर वो कुछ पल याद आ गए.. "फ्रेशर पार्टी" से पहले त्यागी मेरी टाई तैयार कर रहा था.. १०-१२ साल से खुद ही तैयार होके स्कूल जाता था मैं .. उस से पहले माँ ने कभी कभार थोडी बहुत मदद कर दी होगी तैयार होने में, पर उस दिन जिस तल्लीनता के साथ त्यागी टाई बाँध रहा था वो पल स्मृति में हमेशा के लिए छप गए... त्यागी याद आया तो दर्शन भी याद आ ही जाता है.. हालाँकि इसका उल्टा कम ही होता है कि दर्शन याद आये तो त्यागी भी याद आ जाये और उसके अपने स्वाभाविक कारण भी हैं.. हम तीन दोस्त थे... दोस्त अक्सर एक जैसे होते हैं, एक जैसी आदतों वाले या फिर व्यवहार वाले .. हम तीन अलग अलग दिशाएं थे.. सब कुछ सही था बस एक चौथी दिशा की कमी थी.....

उन शामों की रफ़्तार

वो शामें कभी कभी आँखों से यूँ ही टकरा जाती हैं.. दिसम्बर का जाड़ा होता था, foundation day बस ख़त्म हुआ ही होता था.. और semester exams आने वाले होते थे.. पढाई भी लगभग ख़त्म हो चुकी होती थी.. बस कुछ practicals निपटाने होते थे.. कॉलेज ख़त्म होते ही हॉस्टल से change करके cafeteria जाना होता था.. और रास्ते में mess से अपने हिस्से की चाय और snacks लेने भी जरूरी होते थे.. हिस्सा ही होता था वो... चाहे वो कैसा भी हो खाने या पीने में, पर लेना जरूरी सा लगता था.. ऐसी भी कई चीजे लगती थी जिसे ना करते तो कोई फर्क नहीं पड़ता, पर फिर भी करनी ही होती थी... कुल मिला जुला के अपना हिस्सा वसूल करना होता था.. सर्दियाँ कोई बहुत सुहानी नहीं होती थी.. हमेशा ठिठुरने वाली होती थी. लिहाजा पता होता था कि २ घंटे में अँधेरा हो जायेगा, बाहर घूमना थोडा मुश्किल होगा..तो बस वो २ घंटे होते थे जीने के लिए, सारे दोस्तों के साथ, हंसी और मजाक के बीच॥ एकदम खुल के जीने होते थे वो २ घंटे॥ सूरज छिपने के बाद अँधेरा होने से पहले जितनी रौशनी बिखर सकती थी.. उतनी ही बिखरती थी चप्पे चप्पे पे.. कहीं वो ७ लोग एक घेरे में खड़े होके आठवें की...

अक्तूबर २००२

मैं असीम अनंत और अपराजेय का, बन न पाऊं कभी विकास | हो सके प्रभु, गर तेरे बस में, कर दे जीवनशक्ति का विनास | मैं झूलता रहूँ कुपित सृष्टिपथ पर, न न्योछावर हो जाऊं किसी शपथ पर, कभी न चलूँ अब इस ज़मीन पर, कर दे सवार मुझे मृत्युरथ पर, अपनी अक्षमता और अविवेक का, हो न पाए कभी ह्रास | हो सके प्रभु, गर तेरे बस में, कर दे जीवनशक्ति का विनास | मैं अब्रह्माण्ड की माया का जालभुक्त न बनू कभी, एक एक कर तोड़ दे, साथ मेरे हैं जो सभी, लोभी बन जाऊं प्रलोभ का, जी ना पाऊं चैन से, मृत्यु आ अंक लगा, और वरन कर मेरा अभी| भूत मेरा खो चुका और भविष्य बना दे तू इतिहास | हो सके प्रभु, गर तेरे बस में, कर दे जीवनशक्ति का विनास |

इन्सान वाकई बेहतर है...

कुछ लोग कहते हैं कि हर दिन के समापन के साथ सिर्फ़ इस बात का महत्व है कि दिन के अन्तिम क्षणों में आप खुश हैं या नहीं .. कुछ लोग ये भी मानते हैं कि हर हाल में खुश रहना आपके ऊपर निर्भर करता है.. दुःख को कुछ लोग खोखला भी मान सकते हैं.. क्योंकि ऐसे लोग दुःख की तीक्ष्णता में यकीन रखते हैं.. मुझे कोई गुरेज नहीं अगर आप ये तुलना करना चाहते हों कि किसे ज्यादा दुःख होगा.. उसे जो सड़क के किनारे भूखे पेट सोया है या फ़िर उसे जिसने किसी वजह से अपना हाथ खो दिया है और उसके पास कमाने का कोई साधन नहीं है.. आपको तुलना करनी है आप करिये.. मुझे दुःख की तीक्ष्णता से कहीं ज्यादा अफ़सोस दुःख की उपस्तिथि का है॥ हम सभ्यता के सिंधु में गोते लगाते हुए कितने आत्म-सम्मान के साथ ये बात महसूस करते हैं कि मनुष्य जानवरों से कितना बेहतर है.. पर ज़रा सोचिये वो सोच अपने आप में कितना वजन रखती है जिसने मनुष्य को जानवर के साथ तुलना के लायक तो सिद्ध कर दिया.. क्या फर्क पडा अगर मनुष्य बेहतर साबित हुआ.. तुलना तो जानवर से ही हुयी... डायनासौर इस धरती से विलुप्त हो गए.. कभी आपको ये सोच कर दुःख होता है.. ? क्यों .. क्यों नहीं होता है.. ...

मेरी दैनंदिनी - अन्तिम भाग

१६ मार्च २००८ क्या आप ये मानते हैं कि दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं जो आप नहीं कर सकते ? अगर नहीं तो फ़िर ये आपके पढ़ने के लिए नहीं लिखा जा रहा है॥ कभी कभी सदियों के सफर को एक पल में समेट लेना इतना भी मुश्किल नहीं होता है जितना कई बार हमें लगता है.. आज से तीन साल पहले जिंदगी पारुल और रोशनी के तराजू में झूल रही थी, फैसला तो मैं आज भी नही कर सकता कि उस वक्त मैं क्या चाह रहा था और मेरी सोच कितनी सही थी.... पर इन तीन वर्षों में मैंने एक चीज जानी है.. इन्सान की जिन्दगी ४ आवरणों से ढकी होती है ॥ पहली सतह उसका ख़ुद का सच होती है , उसकी मान्यताएं, उसके विश्वास , उसकी श्रद्धा , उसका समर्पण और उसका इंतजार ... ये सब मिला के उसकी पहली सतह का निर्माण करते हैं॥ जिसे कभी कभी हम लोग स्वार्थ की नजर से , कभी अहम् की नजर से देखते हैं... उसका दूसरा आवरण बनाती है उसका प्यार.. उस एक इन्सान का वजूद जो उसके अस्तित्व के कण कण में व्याप्त होता है ॥ तीसरा आवरण दोस्त , चाहत , खुशियों की इच्छा और हर उस चीज से बनता है जिसे इंसान अपना कहता है.. नाते रिश्ते, जन्म मृत्यु के बन्धन ,सुख चैन सब यहीं आकर निर्धारित होते हैं......

तुम भाग-२

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महक उठे मिट्टी भी , वो एक बरसात हो तुम, रोशन कर दे ज़र्रा ज़र्रा , पूनम की रात हो तुम, मेरे लिये वजह तो कभी कुछ थी ही नहीं मगर, जीता हूँ जिस जिसके लिये , वो हर बात हो तुम। खुशनुमा सुबह हो, या उससे पहले की सहर हो तुम, वक़्त हो पल भर का,या जीवन का हर प्रहर हो तुम, चाँद को कह तो दूँ , प्रतिमान सुन्दरता का मगर, चाँदनी की किस्मत पर , रूप का कहर हो तुम। सिर्फ एक मौसम हो , या पूरी बहार हो तुम, पहली खामोशी हो , या आखिरी पुकार हो तुम, लड़ने की आरज़ू हो, या मरने की हसरत हो, जीत हो किसी की ,या किसी की हार हो तुम। अहसास तुमको ना सही , किसी का अहसास हो तुम, दुनिया बदल दे जो, दिल की वो आवाज़ हो तुम, खुद की अहमियत से हो अन्जान, पर अब तो जान लो, कि सुरों की थिरकन हो , जीवन का साज हो तुम। क्षितिज हो किसी का, किसी का फलक हो, हंसने की वज़ह हो, खुशियों की झलक हो, अपने वज़ूद को समझने की कोशिश तो करो, लड़ने का इरादा हो तुम, जीत की ललक हो.