इन्सान वाकई बेहतर है...
कुछ लोग कहते हैं कि हर दिन के समापन के साथ सिर्फ़ इस बात का महत्व है कि दिन के अन्तिम क्षणों में आप खुश हैं या नहीं .. कुछ लोग ये भी मानते हैं कि हर हाल में खुश रहना आपके ऊपर निर्भर करता है.. दुःख को कुछ लोग खोखला भी मान सकते हैं.. क्योंकि ऐसे लोग दुःख की तीक्ष्णता में यकीन रखते हैं.. मुझे कोई गुरेज नहीं अगर आप ये तुलना करना चाहते हों कि किसे ज्यादा दुःख होगा.. उसे जो सड़क के किनारे भूखे पेट सोया है या फ़िर उसे जिसने किसी वजह से अपना हाथ खो दिया है और उसके पास कमाने का कोई साधन नहीं है.. आपको तुलना करनी है आप करिये.. मुझे दुःख की तीक्ष्णता से कहीं ज्यादा अफ़सोस दुःख की उपस्तिथि का है॥ हम सभ्यता के सिंधु में गोते लगाते हुए कितने आत्म-सम्मान के साथ ये बात महसूस करते हैं कि मनुष्य जानवरों से कितना बेहतर है.. पर ज़रा सोचिये वो सोच अपने आप में कितना वजन रखती है जिसने मनुष्य को जानवर के साथ तुलना के लायक तो सिद्ध कर दिया.. क्या फर्क पडा अगर मनुष्य बेहतर साबित हुआ.. तुलना तो जानवर से ही हुयी...
डायनासौर इस धरती से विलुप्त हो गए.. कभी आपको ये सोच कर दुःख होता है.. ? क्यों .. क्यों नहीं होता है.. ? तब आपकी मानवता कहाँ चली जाती है ? जब आपको ये सुनकर किसी जीव के जाने का दुःख नही होता बल्कि आपको अफ़सोस होता है कुछ खो जाने का जैसे कि वो आपकी विरासत रहे हों.. जैसे कि भगवान ने दुनिया की हर चीज का निर्माण मनुष्य को केन्द्र में रखकर किया हो...
आपके सामने एक जानवर मरा पड़ा हो, अगले पल एक चींटी मरी पड़ी हो और दूसरे पल इक इंसान ॥ किस चीज का दुःख आपको ज्यादा होगा.. क्यों ? सिर्फ़ इसीलिए कि इंसान सभ्यता के उस किनारे पर साँस लेता है जहाँ आप जी रहे हैं ?क्या ये सच नहीं है कि जीने कि जरूरतों के सिद्धांत इन्सान ने जानवरों से ही सीखे हैं ? तो फ़िर क्यों क्या आज मानवता जिस स्तिथि में आ गयी है उसके लिए इंसान जिम्मेदार हालातों को ठहरता है.. क्यों है इंसान के अन्दर जीने कि इतनी प्रबल इच्छा कि अपने आज और अपने कल के अलावा उसे आज से हजारों साल बाद भी होने वाली हर छोटी बड़ी चीज की परवाह है ? ये सच है कि एक सीमा के बाद इंसान जानवर हो जाता है... इंसान को शायद ये बात सख्त नापसंद हो॥ पर कभी सोचिये.. वो सीमा आख़िर प्रारम्भ कहाँ पर होती है ?
मेरी मानिए सोच के .. सिद्धांतो के , उसूलों के.. ये झूठे दंभ छोडिये .. वक्त है इस सच्चाई को स्वीकार करने का कि हजारों साल कि मेहनत के बावजूद इंसानियत आज भी जानवरों से ही तुलना के ही लायक है... देवत्व के बारे में हमारी हर सोच कहीं जाकर सिर्फ़ इसीलिए रुक जाती है क्योंकि हम आज भी अपने जानवर होने के अहसास को भुला नहीं पाए हैं....
क्या चाहिए हमें.. ? हम सभ्य समाज के ध्वजवाहकों को ?
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