एक किस्सा - भाग २
पहली किश्त
मानता हूँ कि पहली मुलाकात हमेशा सही तथ्य प्रस्तुत कर सके , ये आवश्यक नहीं.. परन्तु पहली मुलाकात में कुछ ऐसी चीजे छुपी होती हैं.. जो आपके सामंजस्य की दिशा निर्धारित करती हैं.. अंजलि और मैंने साथ साथ ही कंपनी ज्वाइन की थी. हम कोई बीस या बाईस लोग थे जिन्होंने साथ में ज्वाइन किया था.. उस पूरे बैच में एकलौता अक्लमंद राकेश ही था शायद.. बाकि सब मेरी ही तरह थे. जिन्हें अच्छे परिणाम तभी मिलते हैं जब वो कोई मेहनत नहीं करते.. और जहाँ मेहनत कर बैठे वहाँ कुछ तो ऐसा होता है कि जितनी मेहनत परिणाम पाने के लिए की हो, उससे ज्यादा मेहनत उस परिणाम को भुलाने के लिए करनी पड़ती है..
मैं रीवा को भुलाने की मेहनत आज भी कर रहा हूँ शायद..
खैर.. शुरू के कुछ दिनों में हमें कंपनी के बारे में बताया गया.. कंपनी का इतिहास इस तरह बताया गया कि मुझे ऐसा महसूस हुआ कि 1857 की लड़ाई में हारने के बाद से जैसे सारे भारतीय इसी नेक काम में लगे रहे और फलस्वरूप देश को आज़ादी के लिए नब्बे साल इंतजार करना पड़ा.. कुल ले देके 600 लोग हैं कंपनी में पर ऐसा लगा मानो आधे हिंदुस्तान में रोटी इसी कंपनी की वजह से बनती होगी..
सात दिन का वो समारोह मेरे दिल के आज भी बेहद करीब है.. हर लेक्चर इतना बोरियत भरा होता था कि नब्बे प्रतिशत तो मैं सोया हुआ ही पाया जाता.. खैर वो सिर्फ नाम की ट्रेनिंग ही नहीं थी..आजतक काम के वक़्त वही करता हूँ जो उन सात दिनों में सीखा था.. कभी कभी तो जब घर से काम करता हूँ तो mail करते हुए गलती से "working from home" की जगह "sleeping from home" लिख देता हूँ.
खैर एक दिन मैंने सचमुच में ध्यान से पढाई की .. क्यूंकि उस दिन "corporate discounts" के बारे में बताया जा रहा था..
उसके ठीक अगले दिन एक लेक्चर चल रहा था.. जिसमे ये बताया जा रहा था कि जब कंपनी काम करके बोरे हो जाती है तो समाजसेवा के क्या क्या काम करती है.. मैं और राकेश सबसे पीछे बैठे थे.. एक बुजुर्ग से दिखने वाले शख्स की धुंधली धुंधली सी याद है क्यूंकि मैं सो रहा था.. और यकीन मानिये मेरा, राकेश यहाँ पे भी नोट्स बना रहा था.. जाने भगवान कुछ लोगों के साथ ये अन्याय क्यूँ करता है.?..
खैर जब वो बुजुर्ग हमें समाजसेवा की उपयोगिता समझा रहे थे मैं सपने देखे बिना सोने का भरसक प्रयास कर रहा था.. अचानक "बार गर्ल्स" शब्द सुनाई दिया.. हलकी सी आँख खुली तो देखा मेरे प्रवक्ता मेरी तरफ ही देखते हुए बता रहे थे.. कि समाजसेवा का एक प्रयास "बार गर्ल्स" के जीवन को बेहतर बनाने के लिए भी कंपनी द्वारा किया जा रहा है.. मेरी नींद तो टूट गयी पर जब मैं सोया था कुछ ऐसा हुआ जिसका अहसास मुझे हुआ नहीं.. राकेश मेरे बाजू वाली सीट से उठकर बाहर गया और एक लड़की उसकी जगह आके बैठ गयी. क्यूंकि मैं सो रहा था लिहाजा मुझे बिलकुल अहसास नहीं हुआ..
आँख खुली तो देखा कि सर की नज़रें मुझ पर ही है..तो मुझे जागने के बाद भी ये भांपने का मौका नहीं मिला कि मेरे बाजू में राकेश नहीं बैठा है॥
"बार गर्ल्स" वाला topic अभी भी चल रहा था.. मुझे मजाक सूझा एक ...
मैंने हलके से गर्दन राकेश की तरफ झुकाई और धीरे से फुसफुसाते हुए बोला.. " यार अपनी कंपनी के कार्ड पे corporate discount मिलता होगा क्या bars में ?"
वो बुजुर्ग अभी भी मेरी तरफ देखकर कुछ बता रहे थे.. और मेरी निगाह बराबर उन पर टिकी थी.. और शायद मेरे बाजू वाले की निगाहें मुझ पर.. मुझे कुछ तो अप्रत्याशित सा लगा ..पलट कर राकेश की तरफ देखा तो मैं एकदम उछल पड़ा.. मैंने चुपचाप बंद पड़े मोबाइल को कान पे लगाया और "हेल्लो" कहता हुआ वहाँ से निकल गया..
ये अंजलि राजाध्यक्ष से मेरी पहली मुलाकात थी..
अगले दिन हमारी software engineering की क्लास थी.. राकेश और मैं हर क्लास में सबसे पीछे बैठा करते था.. राकेश तो मेरे साथ सात साल से साये की तरह चिपका था.. कभी कभी सोचता हूँ कि मेरे साथ रहके वो इतना अक्लमंद है अच्छी संगत में होता तो शायद आज बहुत अच्छे मकाम को हासिल कर चुका होता..
अब उस पूरी क्लास में आगे की चाहे कितनी भी सीटें खाली हों , मुझे सबसे पीछे ही बैठना होता था और राकेश को मेरे साथ..मैं सोता और वो श्रोता बनके अच्छे विद्यार्थी कि फ़र्ज़ अदायगी कर रहा होता..
अपनी आदत के मुताबिक मैं "corporate discount" वाले हादसे को भूल चुका था.. क्लास शुरू हुए पाँच मिनट हुए ही होंगे कि कोई मेरे साथ वाली खाली सीट पर आकर बैठ गया... उस कंपनी के पाँच दिन के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि राकेश और मेरे अलावा कोई तीसरा आखिरी सीट पर बैठा था.. और ये तीसरा कौन था.. इसका अंदाजा लगाने के लिए मैं किसी को फूटी कौडी भी नहीं दूंगा...
"corporate discount" वाला हादसा फिर ताजा हो गया.. मैंने एक बार गौर से उसकी तरफ देखा.. वो हलके से मुस्करायी मानो कल वाली बात उसे आज समझ में आयी हो.. खैर जब वो मुस्कराती है तो मुझे रीवा याद आ जाती है.. वैसे वो ही नहीं.. कोई भी लड़की मुस्कराती है तो रीवा ही याद आती है...
सन् २००२ , रूडकी के रेलवे स्टेशन पे रात के सात बजे मैं हेमकुंड एक्प्रेस का इंतज़ार कर रहा था.. कॉलेज में रैगिंग ख़त्म हो चुकी थी.. मैं रीवा को अभी तक देख भी नहीं पाया था.. लोग बहुत बात करते थे.. कुछ ज्यादा ही ..पर मुझे खोजने पे भी गिनीचुनी लड़कियों में कोई ऐसी दिखाई नहीं दी कि मैं दावे से कह सकूँ कि येही है जिनका जिक्र सेमेस्टर एक्जाम से ज्यादा होता है कॉलेज में..
मेरे ठीक सामने एक मुस्लिम परिवार बैठा था.. दो छोटे बच्चे उनके माता पिता और एक लड़की जिसके साथ वो खाला खाला कहकर हंस खेल रहे थे..
सफ़ेद लिवाज में वो लड़की काफी सौम्य लग रही थी.. स्टेशन पर हल्का सा अँधेरा था उसकी सूरत मुझे साफ़ नजर नहीं आ रही थी.. थोडी देर में उन बच्चों कि खाला बच्चों को माँ के पास बिठाकर मेरी तरफ आई.. जब वो मेरे पास से गुजरकर रिज़र्वेशन चार्ट की तरफ बढ़ी तो मैं स्तब्ध रह गया.. वो गुजर चुकी थी पर मेरी गर्दन को मानो लकवा मार गया हो.. बहुत देर बाद हिम्मत करके मैंने उस दिशा में देखने कि कोशिश की जहाँ वो गयी थी.. वो मेरे ठीक पीछे ही खड़ी थी..
पहली बार शायद मैंने किसी की तरफ इतने गौर से देखा होगा, पर उसको हर कोई गौर से ही देखता होगा लिहाजा उसे कोई फर्क नहीं पड़ा. कोई १९-२० साल की रही होगी वो.. रेलवे स्टेशन के उस अँधेरे कोने में रिज़र्वेशन चार्ट में अपना नाम खोज रही थी... काफी देर के बाद ऐसा लगा मानो उसे सफलता मिली हो, कंधे से पर्स उतारकर उसने टिकेट निकाला और एक बार फिर चार्ट पे सरसरी नजर दौड़ाई. अपना नाम सही होने की पुष्टि कर रही हो या शायद टिकेट सही होने की. कौन जाने?
इतना सब करते हुए उसे मालूम था कि मैं उसे देख रहा हूँ.. पर उसने ये ज़ाहिर नहीं होने दिया.. खैर मुझे भी मालूम था कि उसे मालूम है और मैंने भी ये ज़ाहिर नहीं होने दिया..
ऐसा जाने कितनी ही बार होता है.. हमें सब पता होता है पर अनजान बने रहने से बेहतर कोई विकल्प नहीं होता.. हाँ ऐसा करते हुए छद्म परिस्तिथियाँ न उत्पन्न हों ऐसी कोशिश हम जरूर करते रहते हैं..
ट्रेन आने में कोई चालीस मिनट बाकी होंगे.. मैंने घड़ी देखी, सिर्फ घड़ी देखी समय नहीं देखा.. समय से ऐसे भी किसे मतलब था.. खैर मतलब तो घड़ी से भी नहीं था...
वो वापस बच्चों के पास जाके खेलने लगी.. मैं उसे खेलते देखने लगा.. उसकी खूबसूरती अब अँधेरे की मोहताज़ नहीं थी.. ना ही उसका बचपना..
मैं पहली बार अकेला अम्बाला जा रहा था..
शायद पहली बार अकेला कहीं जा रहा था.. इसके बावजूद भी मैंने टिकेट नहीं ख़रीदा था.. ट्रेन आई.. तो वो दोनों बच्चों के गाल चूमकर उनकी माँ के गले लगी और "बाय बाय" कहती हुयी ट्रेन में चढ़ गयी..
मुझे जानकर थोड़ा अच्छा लगा कि वो अकेले सफ़र कर रही है.. मैं उस सफ़र को सिर्फ उसे देखते हुए काटना चाहता था.. लिहाजा मैं उसी डिब्बे के आसपास घूमता रहा.. आजूबाजू देखता रहा कि TT तो नहीं घूम रहा है.. और जैसे ही ट्रेन चली मैं ठीक उसी डिब्बे में चढा... और सीधे जाके उसके ठीक सामने वाली सीट पे..
उसने मुझे देखा.. चिंता की एक हलकी सी लहर उसके चहरे से होकर गुजरी.. पर फिर उसने एक किताब निकालकर पढना शुरू किया... मैं सोच ही रहा था..कि बात करूँ या नहीं... करूँ भी तो कैसे करूँ.. इतने में किसी ने कंधे पे हाथ रखा..." टिकेट ...????"
TT के इस एक सवाल के साथ कई सवाल फिजाओं में तैर गए.. जिनमे मेरा सवाल सबसे मासूम था शायद.. "हे भगवान्.. इसी वक़्त क्या..?"
TT ने मुझे बात पूरी किये बिना बाकी लोगो के टिकेट चेक किया...
"क्या नाम बताया मैडम ??"
"रीवा... रीवा..उपाध्याय.."
"ओके .. middle birth.. हाँ बेटा... तुम बैग उठा के मेरे साथ आओ... तुम्हे ट्रेन घुमा के ले आऊं...."
(जारी...)
Comments
अगले भाग के लिए बेसबरी से इन्तेज़ार में ...
Regards
Divya Prakash Dubey