एक किस्सा ...तृतीय भाग..
आज सोचता हूँ तो अजीब सा लगता है...
सिर्फ खूबसूरती अगर किसी बात का पैमाना होती मेरी नजर में, तो जाने कितने मापतोल यूँ ही आदर्शों की लकीरों पे इस तरह न बिखरे होते... और बात सिर्फ लड़कियों की नहीं हैं.. किसी की भी.. मुझे कभी वो पहलू समझ नहीं आया, जिसके आधार पर मैं किसी को अपने करीब आने देता हूँ... रीवा को उस दिन रेलवे स्टेशन पर देखने से बहुत पहले, कभी कभी तो लगता है कि उसका नाम सुनने से भी बहुत-बहुत पहले मैं उसे जानने लगा था...
वो एक अजीब पागलपन होता है.. जो प्यार नहीं होता... क्यूंकि प्यार जैसे शब्द भी आप नहीं सोचते उस वक़्त.. वो कोई जिद्द नहीं होती.. क्यूंकि उसे पाने की इच्छा नहीं होती... वो आकर्षण भी नहीं होता क्यूंकि कई बार तो उसे देखा भी नहीं होता..."रीवा" कुछ नहीं होती..मगर सब कुछ होती है... और कभी कभी ताउम्र सब कुछ रहती है....
अगर कोई "रीवा" आपके जीवन में कभी आई हो तो आप समझोगे कि क्यूँ एक राजकुमारी मीराबाई नाम से जगविख्यात होती है... भगवान से तुलना भी नहीं कोई उसकी... क्यूंकि "रीवा" की कोई तुलना नहीं होती... और जैसे कबीर कह गए कि "गुरु गोविन्द दोउ खड़े.." मेरा यकीन मानिये... गुरु के बाद गोविन्द को रीवा के सामने एक बार फिर चुनाव में मात खानी होती है...
मैं यूँ तो सही सही बता नहीं सकता कि आसपास क्या तब्दीली आती है, पर कुछ पहले जैसा नहीं रहता... आपको समझ आने लगता है..कि रूह क्या होती है.. अंतरात्मा किसे कहते हैं... आपको मोहब्बतें जैसी फिल्मों में सार्थकता दिखने लगती है.. अपने अरमानों और हसरतों के बीच अंतर समझ आने लगता है... आपको पता चल जाता है.. ये जहान आज तक इतना सूना सूना सा क्यूँ लगता था.. आप महसूस करने लगते हो सारी दुनिया कितनी तेज भाग रही है और आप कितने स्थिर हो.. आपके साथ इतना सब कुछ हो जाता है पर कमाल ये होता है कि "रीवा" को कुछ नहीं पता होता...
भारतीय रेल में सफ़र करने के दो फायदे मुझे उस दिन समझ आये... पहला ये कि बिना टिकेट होने के बावजूद भी आपको अपनी मनपसंद सीट मिल सकती है... बस TT की कुछ terms & conditions आपको माननी पड़ती हैं... और दूसरा ये कि जिस अम्बाला को तीन घंटे में आना चाहिए वो सात घंटे में भी आ सकता है.. और जिस दिन आपको जरूरत हो उस दिन आये तो फिर क्या कहना...
वापस आके मैं ठीक उसी सीट पे इस अंदाज में आके बैठ गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो... थोडी देर तक उसकी तरफ देखता रहा.. वो अभी भी पढ़ रही थी बीच बीच में मेरी तरफ देख लेती और फिर वापस किताब की तरफ.. उसके चहरे पे मुझे देखकर अब कोई भाव नहीं थे.. शायद TT के सामने मेरी घिघ्घी बंधती देखकर उसे समझ आ गया होगा कि इस प्राणी से कोई खतरा नहीं है... काफी देर तक उसे निहारने के बाद मुझे समझ आया कि शायद थोड़ा अजीब लग रहा है..तो अपने बैग से मैंने भी पढ़ने के लिए कुछ निकाल लिया ..
चाय आई , कॉफी आई, कोल्डड्रिंक्स , आलू पूरी और भी भगवान जाने कितनी चीजे आई .. पर हम दोनों एक दुसरे के सामने किताबे खोलकर बैठे रहे...
वो "we the living" पढ़ रही थी और मैं "कफ़न" खोल के बैठा था..
"कफ़न" मैं तीसरी बार पढ़ रहा था... या यूँ कहे दो बार पढ़ चुका था.. तीसरी बार देख रहा था आज.. हर पेज से मैं सात-आठ शब्द पढ़कर सोच रहा था कि किस शब्द से बात शुरू की जा सकती है.. मेरे अन्दर तीन अलग अलग तरह के संकोच थे..
पहला ये कि किसी लड़की से कभी ट्रेन में बात नहीं की थी.. चलती हई तो छोडिये कभी रुकी हुयी ट्रेन में भी नहीं...
दूसरा मेरी इमेज को भारतीय रेलवे पटरी से उतार चुका था अब तक...
और तीसरा वो "रीवा" थी... वो वो थी जिसका आना मेरी ज़िन्दगी में कई साल पहले तय हो चुका था...
"दोस्ती करोगे मुझसे???" मेरा ध्यान सॉफ्टवेर इंजीनियरिंग की क्लास में वापस आया...
"नहीं..." मैंने दायीं तरफ मुड़ के देखा राजीव हम दोनों को ही देख रहा था..
"क्यूँ?"
"फालतू कामों के लिए वक़्त नहीं है मेरे पास.."
"सोच लो.. "
"सोच लिया"
"अच्छा ये बताओ कि कल क्या सोचकर मुझसे पूछा तुमने ? और पूछ लिया था तो फिर उठ कर चले क्यूँ गए...?"
"ऐसे ही ... तुम्हारी शकल पसंद नहीं आई मुझे"
"यही तो.... और मुझे तुम्हारी शकल एकदम से पसंद आ गयी.."
मैंने उसकी तरफ मुड़ के देखा , उसने हलके से दोनों पलकें झुकाई और वापस बड़ी बड़ी आँखें खोलकर मेरी तरफ देखा.. हलके से मुस्करायी..
"ये जो पढ़ा रहा है ना .. गौरव.. ये मेरा बहुत बड़ा crush हुआ करता था एक टाइम पे"
"तुम जानती हो इसे.."
"हाँ.. मेरा सीनियर था कॉलेज में.."
क्लास ख़त्म हो गयी... लंच ब्रेक था..सब एक एक करके जाने लगे.. रह गए सिर्फ तीन लोग ..क्लास में सबसे पीछे बैठे हुए... राकेश अब तक लिख रहा था.. सोचा उसे एक बार बता दूँ कि क्लास ख़त्म हो गयी है मेरे भाई .. बस कर दे अब. पर चुप ही रहा.. राकेश कागज बर्बाद करता रहा और हम दोनों वक़्त.. उस खामोशी में बिना कहे ना चाहते हुए एक दोस्ती ने जन्म ले लिया... एकतरफा प्यार के बाद ये एकतरफा दोस्ती से मेरी पहली मुलाकात थी...
"गर्ल फ्रेंड है तुम्हारी कोई ??" राकेश को लिखने से रोकने के लिए शायद ये एकलौता सवाल था..
"नहीं.." मैंने बिना कुछ सोचे कहा..
राकेश समझ चुका था शायद कि उसे भी लंच कर लेना चाहिए...
उसके जाने के बाद भी हम खामोश बैठे रहे... मुझे अपने ऊपर भरोसा था पर अंजलि पर कतई यकीन नहीं आ रहा था,,उस वक़्त...और सबके जाने के बाद सिर्फ हम दोनों ही क्यूँ बैठे हैं एक दूसरे से बंधकर
कोई बीस मिनट के बाद दूसरी क्लास प्रारंभ हो गयी... उस दिन शुक्रवार था..अगले दो दिन छुट्टी थी...
पुणे में बारिश बहुत होती है.. बेमतलब... खामोशी से ..बिना किसी का कोई नुकसान किये...कभी कभी अच्छी लगती है ये बारिश..और weekends पे भी इस बारिश का अफ़सोस नहीं होता मुझे... मैं अक्सर अपनी खिड़की पे आके बाहर होती हुयी बारिश को देखता रहता हूँ...
गौरव और राकेश अन्दर बैठ कर कुछ बातें कर रहे हैं.. बारिश की झमझम के बीच उनकी बातें मुझे समझ से परे लगती हैं... सोचता हूँ ये भी कौन सी कैटेगरी बनायीं हैं भगवान ने... शनिवार को सुबह साढ़े ग्यारह बजे मदहोश सी बारिश की बूंदों को एक किनारे रखकर जो "white box testing" और "black box testing" पे विचार विमर्श कर रहे हैं... राकेश की नजर में गौरव "software engineering" का न्यूटन, आर्कमिडीज, और भाष्कराचार्य सब कुछ था... कभी कभी वो मुझसे जब मासूमियत से पूछता :- "यार !! किसी के concepts इतने क्लेअर कैसे हो सकते हैं.."
मैं दिमाग में इस बात का जवाब सोचता कि अंजलि जैसी लड़की ने इस बन्दे में ऐसा क्या देखा एक वक़्त....क्या ये जानता होगा इस बात को..कि अंजलि इसे पसंद करती थी... और मैं इतना क्यूँ सोच रहा हूँ इनके बारे में...
एक बार कमरे के अन्दर झाँक कर देखता हूँ.. दोनों अब भी आपस में दिमाग की खुजली भिड़ा रहे हैं... हलकी सी कोफ्त हुयी...
राकेश ठीक था कुछ साल पहले.. इसकी इस हालत की जिम्मेदार भी एक लड़की है... ये सब कसूर घूम फिरके बेचारी लड़कियों पे ही क्यूँ आते हैं... सुहानी बारिश थोडा तनाव में ले आती है इस तरह...
"नवम्बर में इतनी बारिश होती क्यूँ है आखिर..?? " मैंने ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए जैसे खुद से पूछा ....
"ताकि उन पौधों, और बेचारे जानवरों को थोडी राहत मिल सके.. जो आपकी और हमारी तरह सुविधाओं का दु:उपयोग नहीं करते..." ये रीवा उपाध्याय के पहले कुछ शब्द थे मुझसे मुखातिब होते हुए....
"जी ..मैं समझा नहीं.."
"कुछ नहीं...आपको अगर सोना हो तो आप लाइट बंद कर सकते हैं...मुझे बता दीजियेगा.."
उस कम्पार्टमेंट हमारे अलावा सिर्फ दो लोग थे और एक साइड कि लाइट बुझा के सो चुके थे... शायद...
"नहीं ..मुझे तो बस थोडी देर में उतरना है... पर आप इतने गुस्से में क्यूँ है...??"
"अरे नहीं तो..."
"कौन सी branch में हो आप ?"
"जी.????"
"कुछ नहीं..."
"जी...."
खिड़की से बाहर देखा मैंने.. कई छोटी छोटी बत्तियां तेजी से दौड़ रही थी... हलके हलके बादलों के बीच में चाँद एकदम स्थिर था..... और उस पर बीच बीच में बारिश की हलकी हलकी बूंदे ...आसपास जितना कुछ बदल रहा था उसमें इस बारिश का सुहाना लगना भी शामिल था...
"बुरा ना माने तो खिड़की गिरा देंगे... थोडी ठण्ड लग रही है.."
"ओह्ह सॉरी ..." कहके मैंने खिड़की गिरा दी...
"माफ़ कीजियेगा...अगर मैंने आपसे थोडी बदतमीजी से बात की हो तो..."
"नहीं तो..."
"मेरा नाम रीवा है..." उसने हलके मुस्कराते हुए कहा तो लगा चाँद थोडा विचलित हुआ आसमान में...
"जानता हूँ..." मुझे अपना नाम ध्यान नहीं आ रहा था उस वक़्त.. वरना बताता उसे..... ये हो क्या रहा था???...
"अरे.. कैसे..." बोल के वो खुद ही जवाब दे गयी.." ओह्ह्ह... वो TT ने पूछा था..."
"नहीं.. कॉलेज में सुना है...मैं आपका सीनियर हूँ..."
सीनियर शब्द का दुप्पट्टे से क्या सम्बन्ध हैं मैं नहीं जानता , पर उसने दुपट्टा ठीक किया..और सीधे बैठ कर बोली.."सॉरी सर ..मुझे पता नहीं था..."
साढ़े तीन सेकंड में लड़की बदल गयी.. उसके हावभाव बदल गए... मेरे अन्दर भी बहुत कुछ बदला शायद...पर रीवा में जो कुछ बदलाव आया था वो ऐसा लगा जैसे सिर्फ मेरे लिए सुरक्षित थे सदियों से ...कैसे उसे बताऊँ... कि वो सिर्फ एक जूनियर नहीं थी...सिर्फ एक लड़की या फिर सहयात्री नहीं थी... वो एक परिकल्पना का साकार रूप थी...
"अरे.. इतना सीरियस होने की जरूरत नहीं है... ये ट्रेन है कॉलेज नहीं है...और वो सब ख़त्म हो चुका है.."
वो खामोश बैठी रही अब भी...
"अरे यार.. तुम ऐसे खामोश अच्छी नहीं लगती..वो रेलवे स्टेशन पे जैसे बच्चों के साथ खेल रही थी..उसी टाइप में अच्छी लगती हो.."
वो अब भी चुप रही... मैं भी बातों में कोई बहुत अच्छा नहीं हूँ असल में..तो पांच मिनट तक चुप बैठा रहा...
फिर भी माहौल जस का तस बना रहा... मुझे थोड़ा असहाय सा महसूस हुआ...मैंने बैग उठा कर उससे बोला..
"अच्छा ठीक है.. मेरे यहाँ बैठने पे अगर तुम ऐसे ही बैठी रहोगी तो बेहतर है कि मैं कहीं दुसरे डिब्बे में जाके बैठ जाता हूँ.."
"नहीं नहीं !!! ऐसी कोई बात नहीं है.."
"वो मुझे बुरा लग रहा है कि मैंने आपसे गंदे से बात क्यूँ की.." बेचारी लड़की को अब भी पछतावा था जैसे पर उसकी आवाज का प्रवाह मुझे समझा रहा था कि वो मुझसे असंयत होके बात नहीं कर रही...
"अरे..तुमने ऐसा कुछ भी नहीं बोला..और मुझे पता भी नहीं चला..."
"अच्छा .. आप बैठ जाइये.. "
मैं वापस बैठ गया... खामोशी अब भी बरक़रार थी...पर एक हल्कापन था उस खामोशी में...
"जी ..मैं कंप्यूटर साइंस ब्रांच में हूँ..." मैं मुस्कराया क्यूँ ? ये नहीं पता पर उसका जवाब अच्छा लगा ....
"मेरा नाम करण है... करण कात्याल "
"रीवा .. रीवा उपाध्याय..." कहके उसने मुस्कराते हुए इस बार हाथ आगे बढाया,
एक पल को दुनिया ३६० डिग्री पे घूम गयी.. मैंने हाथ मिलाया पर पता था कि उसका हाथ थाम रहा हूँ...
बस भारतीय रेलवे आपको इतनी ही सहायता कर सकती है... और उसका हाथ छोड़ते हुए मुझे ऐसा लगा कि ट्रेन रुक रही है...
बड़े बड़े पीले रंग के बोर्ड्स पे काले रंग से छपा "अम्बाला कैंट" मेरे सफ़र के सारे रंगों को खुद में समेट रहा था...
"मेरा स्टेशन आ गया..." कहके मैंने सामान उठाया..."तुम कहाँ तक जा रही हो.??."
"लुधियाना..."
"घर है क्या....??"
"नहीं.. एक दोस्त से मिलने..."
मैंने बैग कंधे पे डालते हुए चलते हुए पूछा : "boyfriend ????"
उसने हलके से गर्दन झुकाई..धीमे से मुस्कराते हुए होठों को हलके से काटते हुए बोला... "कुछ कुछ ऐसा ही..."
उतरने वाली भीड़ ने एक बवंडर की तरह मुझे आगोश में लेते हुए ट्रेन से नीचे धकेल दिया....अँधेरे में डूबा स्टेशन मेरा स्वागत करने को तैयार खड़ा था....
(जारी....)
Comments
awesome line telling the difference in choices and traits of two character in such simple words…
Really good narration.. keep writing......
खूबसूरत कथानक है !! एक प्रोढ़ लेखक की गंभीरता से लेकर एक युवा लेखक के दिल के उफान एकसाथ कलमबद्ध करना वाकई मोहक है !
Wonderful !!!