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मेरी दैनन्दिनी 4

१० मार्च २००५ उस पर पहला पॄष्ठ.. नाम रोशनी शर्मा .. कौन है? क्या है? कहाँ है? कैसी है? नहीं जानता.. अगर जानता हूँ तो बस इतना कि कोई तो थी कभी.. जिसे आज तक मैं भूला नहीं हूँ.. कोई ऐसी जो शायद इस वक़्त मेरे अन्तर्द्वन्दों की एक वजह समाप्त कर सकती है.. मैं जानत्ता हूँ जो इस वक़्त मैं सोच रहा हूँ वो ना तो आदर्शों के दायरे में आता है और ना ही कृत्यों के दायरे में.. पर मेरे सामने सिर्फ़ एक यही रास्ता है पारूल की छाया से बाहर आने का.. खैर सच कहूँ तो एक वक़्त पर वो मुझे पसन्द थी .. कभी ये यकीन नहीं था कि कभी उसकी भेजी हुयी मेल पढ़ूँगा.. और आज हसरत ये है कि दिल के किसी कोने में एक खयाल पनपने लगा है, कि क्या हो अगर वो जीवन में वापस आ जाये.. कौन जाने भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है पर फ़िर भी जिस उलझन से मैं पिछले तीन सालों से निकलना चाह रहा हूँ शायद रोशनी इसवक़्त इकमात्र रास्ता है...

मेरी दैनन्दिनी 3

२२ फरवरी २००५ एक और रात ... जो कुछ अधूरी सी लग रही है, जहँ वास्तव में कुछ सोचने की जरूरत पड़ रही है.. सोचता हूँ जब सब कुछ दाँव पर लगा दिया था, तब तो सब मूक बने देखते रहे ..फ़िर आज क्यों वही सब लोग पूछने लगे हैं " उस वक्त तुम्हें मुझसे मदद मांगनी चाहिये थी.. शायद मैं तुम्हरी मदद कर सकता था." यूं तो इस सवाल के कई निहितार्थ हो जाते हैं, पर ये उन लोगों की दोस्ती के वो अधूरे ज़ज़्बात हैं जिनके छलकने की जरूरत कभी थी ही नहीं .. आज भी नहीं... खैर आज मुझे एक बात पता है.. जिन्दगी सन्तुलन की अवस्था में है, जहाँ कोई आना चाहे तो संयोजित हो जायेगा और कोई जाना भी चाहे तो सहर्ष जा सकता है.. ऐ मेरे दोस्तों सच ये है कि.. ये मेरे ख्वाबों की दुनिया ना ही सही लेकिन, अब आ गया तो दो दिन कयाम करता चलूँ ..

मेरी दैनन्दिनी 2

२० फ़रवरी २००५ पता नहीं , आत्म्विश्वास नाम की कोई चीज होती भी है या नहीं . या फ़िर वो सिर्फ़ एक ज़िद हुआ करती है जो कभी कभी लोगों को हमारे खुद के सच का आईना दिखला जाती है बस...।कभी कभी सोचने लगता हूँ कि क्या वास्तव में हम सिर्फ़ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं या फ़िर हम सभी लोग एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ आदि युद्ध है, मध्य युद्ध है और अन्त भी सिर्फ़ युद्ध... जहाँ हार जीत के मायने नहीं हैं मायने अगर किसी चीज के हैं तो वो ये कि सभी लड़ रहे हैं. वैसे सच कहूँ तो मैं इस लड़ाई से थक गया हूँ अब. दूसरों के बारे में सोचने का ना तो मेरा मन है ना ही शायद कोई ईच्छा... और फ़िर भी अपने आप को समझाने का मैं कोई प्रयास नहीं कर रहा हूँ. सच एक ही रहेगा और चाहे उसे बदलने के लिये आप अपना इतिहास भी बदल लो वो सच नहीं बदलेगा. आप चाहो ना चाहो उस एक सच के साथ जीने की आदत आप विकसित कर लेते हो पर सवाल ये है कि... आखिर ऐसे कितने सच और.. और ऐसा कितनी बार और... पता नहीं दुनिया में ऐसी कितनी बातें होंगी जिनकी व्याख्या किसी के द्वारा ना की गयी होगी और ना की जा सकेगी । फ़िर भी हर कोई जानता है. लेकिन जाने क्यों सबके जानने के...

मेरी दैनन्दिनी

खुदा निगेहबान हो तुम्हारा, धड़कते दिल का पयाम ले लो. तुम्हारी दुनिया से जा रहे हैं , उठो हमारा सलाम ले लो. अपनी डायरी के कुछ पन्नों को सार्वजनिक करने का मन कर रहा है.. कोशिश करुँगा कि किसी को क्षति पहुँचाये बिना ये काम कर सकूँ... घटनाओं के विवरण वाले पृष्ठ कम से कम रहें , ऐसा मेरा प्रयास रहेगा... लोगों के नाम यथासम्भव समान रखने का प्रयास करूँगा पर आवश्यकता पड़ने पर छ्द्म नामों का सहारा लेना मेरी मज़बूरी रहेगी... इस सबके पीछे मेरी मंशा सिर्फ़ अपने आपको पहचानने की है.. किसी को ठेस पहुँचाने या नीचा दिखाने की कतई नहीं......

सफ़र की मज़बूरी... या सिर्फ़ मज़बूरी का सफ़र???

न्यूयॉर्क में सर्दियाँ शुरू हो गयी हैं। तेज भागती यहाँ की ज़िन्दगी में आने वाले समय की परछाई साफ़ नज़र आने लगी है. आने वाले समय का ठहराव दिखने लगा है. काफ़ी समय बाद आज सोच रहा हूँ कि यहाँ के अपने अब तक के अनुभवों को लिखा जाये. आज से कोई ६ या ७ हफ़्तों पहले जब नेवार्क एअरपोर्ट पर उतरा था, तो एक धुकधुकी सी थी मन के किसी कोने में, मुझे रत्ती भर भी अन्दाजा नहीं था कि ज़िन्दगी कितनी अलग हो सकती है यहाँ पर, एअरपोर्ट पर उतरा तो एक अफ़्रिकन टैक्सीवाले ने मुझसे पूछा -"यू नीड ए टैक्सी ?". मैनें उसे अपने गन्तव्य के विषय में बताया तो उसने कहा "फ़ोर्टी फ़ाइव डॉलर.." इससे पहले मैं उससे कुछ कह पाता कि एक आवाज ने मेरा ध्यान अपनी और खींचा " जर्सी सिटी जाना है क्या? " बात हिन्दी में पूछी गयी थी, तो बताने की जरूरत नहीं कि मैंने कौन सी टैक्सी ली होगी । मुझे आश्चर्य हो रहा था कि मैंने ऐसा क्यों किया ?, सिर्फ़ १८ घन्टे के सफ़र ने मुझे भाषावादी और क्षेत्रवादी बना दिया. न्यूयॉर्क की धरती पर मेरा लिया हुआ पहला निर्णय था ये वो भी भाषावादिता की परिधि में। खैर, एक बात है...भारत औ...

मुझे चाँद चाहिये : Platonic love

बहुचर्चित वेबसाईट " विकीपीडिया " पर प्लेटोनिक प्रेम की परिभाषा कुछ इस तरह से दी गयी है; Platonic love in its modern popular sense is a non-sexual affectionate relationship, especially in cases where one might easily assume otherwise. A simple example of platonic relationships is a deep, non-sexual (i.e. overtly romantic) friendship, not subject to gender pairings and not excluding close relatives. प्लेटोनिक प्रेम ......... ये शब्द हमेशा दिल में कहीं कौंधता रहा है मेरे। और अक्सर मैंने कोशिश की है, कि आखिर मैं समझ सकूँ प्रेम के उस अनुपम रूप को जिसकी व्याख्या कर पाना हर लेखक के लिये हमेशा असम्भव सा रहा है। जगजीत सिहं की गज़ल " शायद मैं ज़िन्दगी कि सहर " की चार पंक्तियाँ शायद प्लेटोनिक प्रेम की सही ढंग से व्याख्या कर पायी हैं । "ताउम्र ढूंढता रहा मंजिल मैं इश्क़ की , अन्जाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया। " इसी कड़ी में कुछ वर्ष पहले सुरेन्द्र वर्मा जी का उपन्यास " मुझे चाँद चाहिये" पढ़ा था । और उस एक उपन्यास ने मुझे विश्वास करने पे मज़बूर क...

नफरत है मुझे

नफरत है मुझे, ज़िन्दगी के उन अहसासों से. जो पल पल मुझे यकीन दिलाते हैं, कि मैं हर कदम एक झूठ के साये में चल रहा हूँ. ये जीवन एक मिथ्या के अलावा अगर कुछ है,तो मैं उस पहलु को छूना चाहता हूँ. और शायद इसीलिये मैं कब से भटक रहा हूँ काल के चक्रव्युह में. मुझे खुद नहीं पता कि इस सफर की मंजिल कहाँ है. क्या पता मेरा ये सफर एक अच्छे मुकाम पे पहुँच सके. क्या पता मेरी आखिरी साँस एक सच के साये में आकार ले पाये, शायाद सबसे विशाल सत्य आखिरी सत्य हो ;